भारतीय सेना में अग्निपथ योजना के चलते गोरखाओं की संख्या लगातार घट रही है। इसके चलते चीन का नेपाल पर दबदबा बढ़ रहा है। ये कहना है रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पी आर शंकर का। वे भोपाल में चल रहे लिटरेचर फेस्टिवल में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में भारत-चीन और नेपाल के बारे में भी बताया। पढ़िए पूरी बातचीत… सवाल: चीन नेपाल में अपनी प्रेजेंस बढ़ा रहा है, जाहिर है कि इससे भारत को खतरा है। नेपाल और भारत में बढ़ती दूरियों के कारण क्या हैं? जवाब: देखिए, नेपाल के नौजवान भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट में सेवा देते रहे हैं। उनकी पेंशन हमारे यहां से जाती है, हमारे अधिकारी उन्हें जाकर पेंशन देते हैं। वो हमारा नमक खाते हैं उनकी वफादारी भी हमारे साथ है। इसके अलावा तराइका रीजन में इधर से उधर जाना काफी आसान है। वहां भारत और नेपाल के लोगों का रोटी-बेटी का रिश्ता है। ये बहुत गहरे रिश्ते हैं। इन्हें अगर हम नहीं संभालेंगे तो जाहिर नुकसान तो होगा ही। अब अग्निपथ स्कीम के बाद नेपाल के नौजवानों की गोरखा रेजिमेंट में भर्ती नहीं हुई है। अगर अग्निवीर में रिफार्म हो जाते हैं और नेपाल मान जाता है तो स्थिति मजबूत बनी रहेगी। सवाल: आपने अपनी प्रेजेंटेशन में कहा कि चीन अक्साई चिन को कभी नहीं छोड़ेगा; ये एरिया चीन के लिए इतना अहम क्यों है? जवाब: देखिए ऐसा है कि चीन अक्साई चिन कभी भी इसलिए नहीं छोड़ेगा क्योंकि चीन के कब्जे दो प्रांत- जिंजैंग और तिब्बत के बीच का रोड कम्युनिकेशन अक्साई चिन से होकर ही जाता है। अगर वो रोड कम्युनिकेशन टूट गया तो चीन के लिए तिब्बत को संभालना मुश्किल हो जाएगा। दूसरा ये कि जिंजैंग और तिब्बत दोनों प्रांत चीन के बिल्कुल बॉर्डर पर हैं, अगर अक्साई चिन का रोड नेटवर्क टूटने के बाद यहां पहुंचने के लिए चीन के पीछे की तरफ से करीब 3 हजार किलोमीटर ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी। इसके अलावा अक्साई चिन, चीन के सी.पी.ई.सी. रोड बनाने के लिए भी बहुत अहम है, चीन इस क्षेत्र से होते हुए पाकिस्तान तक एक रोड बनाना चाहता है। रोड और कम्युनिकेशन के अलावा अक्साई चिन अफगानिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे कुल 6 देशों के साथ बॉर्डर साझा करता है। इतने देशों के साथ बॉर्डर साझा करने के कारण ये एरिया बड़ा सेंसिटिव है। सवाल: आपका कहना है कि भारत के साथ बॉर्डर पर चीन बार-बार अपनी रणनीति बदलता रहा है, बॉर्डर पर कौनसी गतिविधियां चीन बदलता रहा है? जवाब: अक्साई चिन से ध्यान हटाए रखने के लिए चीन एक बड़ा ही प्लान किया हुआ गेम खेलता रहा है। चीन ने पहले 1962 में अक्साई चिन से होकर एक रोड निकाली इस समय उन्होंने अक्साई चिन के अलावा अरुणाचल के कई हिस्से हड़प लिए। दूसरी बार गोल पोस्ट चेंज करते हुए 1962 में चीन ने अरुणाचल में दखलअंदाजी की और LAC क्रॉस कर सुन्दरम चू का इलाका हड़प लिया। इसमें हमारा सारा ध्यान उसे LAC से पीछे धकेलने में लग गया और जो अक्साई चिन वाला मूल मुद्दा था पीछे छूट गया। फिर उसके बाद 2003 के सिक्किम समझौते तक अरुणाचल का कोई मुद्दा ही नहीं था लेकिन फिर चीन ने अरुणाचल को साउथ तिब्बत का हिस्सा बताना शुरू किया। फिर उसके बाद 2020 में चीन ने लद्दाख में अटैक किया। तो हम लगे हुए हैं आज के LAC को रिस्टोर करने में और हमारा ध्यान अक्साई चिन को वापस लेने से दूर है। होना ये चाहिए कि हमें अक्साई चिन को वापस लेने पर ध्यान देना चाहिए। सवाल: आपने कहा कि चीन और भारत कभी साथ नहीं हो सकते। ऐसा क्यों है? जवाब: चीन और भारत दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं और दोनों अपना बॉर्डर साझा करते हैं। दुनिया में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि ऐसे दो बड़े देश जो कि साथ में इस तरह आगे बढ़े हों, आपस में कनफ्लिक्ट और कॉम्पिटीशन होगा ही। सिर्फ ग्रोथ और बॉर्डर ही नहीं चीन के साथ हिन्द महासागर में इश्यूज हैं, पडोसी देशों में भी इश्यू हैं। हालांकि आज चीन थोड़ा आगे है लेकिन भारत मजबूत हो रहा है और जैसे-जैसे भारत मजबूत होगा चीन को समस्या होगी ही। सवाल: आपने कहा कि चीन का नरेटिव भारत से मजबूत है; तो इसमें भारत को कौनसे सुधार करने चाहिए? उत्तर: सरकार के साथ साथ मीडिया इसमें बड़ा रोल अदा कर सकता है। मीडिया को बताना चाहिए कि चीन में क्या चल रहा है। चीन एक ‘टेरिबल डेमोग्राफिक चेंज’ से गुजर रहा है। उसकी कम्युनिस्ट पार्टी भी 100 साल पूरे कर चुकी है, वो भी जल्दी टूट जाएगी। चीन में सेंसरशिप के बावजूद अन्य तरीकों से भी हम अपना मैसेज चीन के लोगों तक पहुंचा सकते हैं। चीन के नरेटिव को काउंटर करने के लिए ये बहुत जरूरी है कि हम अपने लोगों को अपने साथ इन्वॉल्व करें, और चीन के बारे में भावुक होने के अलावा समझदारी से भी अध्ययन करें। जनशक्ति को इकट्ठा कर हम नरेटिव भी बना सकते हैं और सब कर सकते हैं। इसके लिए पॉलिसी होनी चाहिए। इस नरेटिव की लड़ाई में भी चीन एक बड़ी गलती कर चुका है। 1962 के युद्ध के बाद 60 साल में नई पीढ़ी के मानस में चीन के खिलाफ नरेटिव कमजोर हो गया था। लेकिन 2020 में चीन ने फिर टकराव पैदा किया और भारत की इस पीढ़ी को भी ये समझ आ गया कि चीन हमारा दुश्मन है। आज लोग चीन के बारे में सोचते हैं।


