एक कथित सड़क हादसे में पैर गंवाने का दावा कर 50 लाख रुपए मुआवजे की मांग करने वाले ट्रक ड्राइवर का क्लेम केस जिला कोर्ट ने खारिज कर दिया है। करीब तीन साल चली सुनवाई के बाद इंश्योरेंस कंपनी की सख्त जिरह और ठोस तथ्यों से यह मामला फर्जी साबित हो गया। कोर्ट ने माना कि दुर्घटना संदिग्ध है और पैर कटने का कारण किसी अन्य वजह से जुड़ा हो सकता है। मामला ट्रक ड्राइवर जगदीश पिता भेरू (22) निवासी सैलाना रतलाम का है। उसने 9 नवंबर 2023 को जिला न्यायालय में क्लेम केस दायर किया था। याचिका में कहा गया कि 7 जुलाई 2023 को वह राजस्थान के सन सिटी ट्रांसपोर्ट के मालिक मुकेश चौधरी का ट्राला लेकर देवास से बांसवाड़ा जा रहा था। इसी दौरान सरवन थाना क्षेत्र में एक तेज रफ्तार ट्राले ने उसके ट्रक को टक्कर मार दी, जिससे उसका दायां पैर गंभीर रूप से घायल हुआ और इलाज के दौरान घुटने के ऊपर से उसे काटना पड़ा। ड्राइवर ने खुद को 15 हजार रुपए मासिक आय वाला बताते हुए स्थायी अपंगता के आधार पर 50 लाख रुपए मुआवजा ब्याज सहित देने की मांग की थी। इसके लिए ट्राले के मालिक, चालक और इंश्योरेंस कंपनी को पक्षकार बनाया गया। एफआईआर में देरी और मालिकाना हक ने खोली पोल टक्कर मारने वाले ट्राले की ओर से इंश्योरेंस कंपनी के अधिवक्ता राजेश चौरसिया ने कोर्ट में तर्क रखा कि हादसा 7 जुलाई का बताया गया, लेकिन एफआईआर 15 दिन बाद 22 जुलाई 2023 को दर्ज हुई। जिस ट्रक को जगदीश खुद चला रहा था, उसे केस में पक्षकार ही नहीं बनाया गया। दोनों वाहन राजस्थान पासिंग हैं, जिससे मामला शुरू से ही संदेहास्पद है। क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान ड्राइवर जगदीश ने स्वीकार किया कि जिस ट्राले से टक्कर बताई गई और जिसे वह चला रहा था, दोनों का मालिक एक ही ट्रांसपोर्टर है। यहीं से पूरा मामला उजागर हो गया। पंचनामा और जिरह से कमजोर पड़ी कहानी इंश्योरेंस कंपनी की ओर से यह भी बताया गया कि हादसे को भयावह बताया गया, लेकिन पंचनामा में ट्रक के अगले हिस्से में सिर्फ मामूली स्क्रैच दर्ज हैं। इतनी गंभीर टक्कर में भारी क्षति होनी चाहिए थी, जो मौके के दस्तावेजों से मेल नहीं खाती। एफआईआर भी ट्रक मालिक के मुनीम द्वारा 15 दिन बाद दर्ज कराई गई, जिसे खुद ड्राइवर ने स्वीकार किया। कोर्ट का फैसला जिला कोर्ट ने सभी तथ्यों, दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर माना कि दुर्घटना प्रमाणित नहीं हो सकी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैर कटने का कारण इस दुर्घटना से जुड़ा होना साबित नहीं हुआ है। इसके बाद 50 लाख रुपए का क्लेम निरस्त कर दिया गया। किसी और वजह से कटा पैर! इंश्योरेंस कंपनी के अधिवक्ता के मुताबिक पैर कटने की घटना वास्तविक हो सकती है, लेकिन उसे इस दुर्घटना से जोड़कर मुआवजा लेने की कोशिश की गई। एफआईआर में देरी और वाहन क्षति के विरोधाभासी तथ्य इसी ओर इशारा करते हैं।


