90 के दशक में कार बाजार से बाहर होने की सलाह मिली थी, आज देश की शीर्ष ऑटो कंपनियों में महिंद्रा

4.28 लाख करोड़ रुपए मार्केट कैप है वर्तमान में महिंद्रा ऑटोमोबाइल्स का। 100 से अधिक देशों में व्यापार कर रही है ऑटोमोबाइल सेक्टर में महिंद्रा। 3.24 लाख के करीब कर्मचारी काम कर रहे हैं वर्तमान में कंपनी के दुनियाभर के संस्थानों में। 4.76 लाख के करीब वाहन बेचे 2025 में कंपनी ने भारत में। स्कॉर्पियो की लॉचिंग- 2002 में लॉन्च हुई स्कॉर्पियो’ महिंद्रा के लिए संजीवनी बनी। स्कॉर्पियो ने साबित किया कि महिंद्रा सिर्फ टैक्टर नहीं, बल्कि वर्ल्ड क्लास गाड़ी बना सकती है। सेफ्टी और फीचर्स : टाटा के बाद महिंद्रा दूसरी कंपनी बनी, जिसने सेफ्टी को महत्व दिया। 50 लाख की गाड़ियों में मिलने वाले ADAS जैसे फीचर्स दिए। एक्सयूवी और मोनोकॉक चेचिस- 2011 में महिंद्रा ने एक्सयूवी 500 लॉन्च की। यह महिंद्रा की पहली “मोनोकॉक’ गाड़ी थी। इसमें चेचिस और बॉडी एक होती है। चीते से प्रेरित इस डिजाइन ने महिंद्रा को प्रीमियम प्लेयर बना दिया। ताकत पर फोकस : कंपनी ने निर्णय लिया कि वह सेडान या छोटी कार की जगह एसयूवी पर फोकस करेगी। केयूवी 100 और वेरिटो जैसे मॉडल बंद कर पूरा फोकस एसयूवी पर लगाया। टैक्टर कंपनी वाला ठप्पा- महिंद्रा की सबसे बड़ी समस्या उसकी इमेज थी। लोग उन्हें ट्रैक्टर या पुलिस की गाड़ी बनाने वाला मानते थे। गाड़ियां काफी शोर करती थीं। वाइब्रेशन बहुत अधिक होता था। कमजोर टेक्नोलॉजी : उस दौर में महिंद्रा के पास अपना कोई इंजन या प्लेटफॉर्म नहीं था। वे पुरानी “विलीज जीप’ के चेचिस पर ही नई गाड़ी बना रहे थे। फोर्ड के साथ असफल पार्टनरशिप : महिंद्रा ने 1995 में फोर्ड के साथ मिलकर “फोर्ड एस्कॉर्ट’ लॉन्च की। महिंद्रा को लगा कि वे फोर्ड से कार बनाना सीख लेंगे, लेकिन “एस्कॉर्ट’ फ्लॉप रही। इससे न तो उन्हें टेक्नोलॉजी मिल पाई और न ही मार्केट। डीजल पर अधिक निर्भरता : 90 के दशक के अंत और 2000 की शुरुआत में पट्रोल कारों की मांग बढ़ रही थी, क्योंकि पेट्रोल इंजन सस्ते थे। महिंद्रा की अधिकांश गाड़ियां डीजल वाली थीं। इस तरह छाई महिंद्रा एंड महिंद्रा इन 4 कारणों से छाया था सकंट गंभीर संकट : 1997-2002 के बीच था सबसे खराब दौर शुरुआत : दो भाइयों ने दोस्त के साथ मिलकर रही थी नींव 1945 में लुधियाना में जगदीशचंद्र महिंद्रा और कैलाशचंद्र महिंद्रा ने साथी मलिक गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर स्टील ट्रेडिंग कंपनी के रूप में नींव रखी। आजादी के बाद, संस्थापकों ने 1949 में अमेरिका की “विलीज ओवरलैंड कॉर्पोरेशन’ के साथ करार किया और भारत में “विलीज जीप’ को असेंबल करना शुरू किया। यहीं से महिंद्रा की जीप की शुरुआत हुई। महिंद्रा एंड मोहम्मद था कंपनी का मूल नाम सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी : सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी मारुति, टाटा मोटर्स और हुंडई हैं। जहां टाटा और महिंद्रा के बीच 2 और 3 नंबर की सीधी लड़ाई है। ऐसे पड़ा नाम : शुरुआत में इसका नाम महिंद्रा एंड मोहम्मद था। 1947 में गुलाम मोहम्मद के पाकिस्तान जाने के बाद कंपनी का नाम महिंद्रा एंड महिंद्रा किया। 1949 में विलीज ओवरलैंड से 75 जीप भारत लाई गईं थीं, जिन्हें महिंद्रा ने एसेम्बल किया गया था। वर्तमान स्थिति इलेक्ट्रिक कार के मामले में भी देश में टॉप-3 में है सरकार के Vahan पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार साल 2025 में यात्री वाहनों की बिक्री के मामलों में महिंद्रा एंड महिंद्रा देश की दूसरी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी बन गई है। इस साल कंपनी ने देश में करीब 4. 76 लाख यात्री वाहन बेचे हैं। वर्तमान में कंपनी 100 से अधिक देशों में व्यापार कर रही हैं। महिंद्रा ऑटोमोबाइल का बाजार मूल्य करीब 4.43 लाख करोड़ रु. है। इसमें करीब 3.24 लाख कर्मचारी काम कर रहे हैं। इलेक्ट्रिक कारों के मामले में भी कंपनी देश में टॉप-3 में है। आईसीआईसीआई बैंक के हेड केवी कामत और आनंद महिंद्रा फ्लाइट में थे। तभी कामत ने कहा, “पता है, जब आपने स्कॉर्पियो का प्रोजेक्ट शुरू किया था, उस समय बोर्ड के कई सदस्यों का मानना था कि अगर यह गाड़ी सफल नहीं हुई तो आपको बाहर कर दिया जाएगा।’ दरअसल स्कॉर्पियो ही वह गाड़ी थी, जिसे महिंद्रा ने खुद पूरी तरह तैयार किया था। पहले विदेशी सहयोग से ही वे गाड़ियां बना रहे थे। इसी गाड़ी ने उन्हें भारतीय कार बाजार में स्थापित किया। हालांकि वर्ष 2000 में लॉन्च हुई बोलेरो ने महिंद्रा को बाजार में टिके रहने की ताकत दी, लेकिन यह मल्टी यूटिलिटी वाहन थी, लोग ऑफिस के लिए मारुति और हुंडई जैसी गाड़ियां ही खरीदते थे। एक ट्वीट में आनंद महिंद्रा ने खुद बताया था कि 90 दशक में एक फर्म ने उन्हें कार बाजार से बाहर होने की सलाह दी थी। फर्म के अनुसार महिंद्रा विदेशी गाड़ियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगी। दरअसल लोग महिंद्रा की “कमांडर’ और “अर्माडा’ को कार मानते ही नहीं थे। इन्हें यूटिलिटी व्हीकल माना जाता था।, लेकिन टेक्नोलॉजी में बदलाव और एसयूवी को ताकत बनाकर आज यह देश की टॉप 3 ऑटोमोबाइल कंपनियों में शामिल हो गई है। ब्रांड से सबक में आज पढ़िए कहानी महिंद्रा एंड महिंद्रा की। सबक क्यों- कंपनी ने कभी भी अपनी ताकत- एसयूवी को बनाना नहीं छोड़ा और अब रोज नए कीर्तिमान बना रही है।महिंद्रा के लिए सबसे खराब दौर 1997 से 2002 के बीच था। इस समय कंपनी के पास कोई सफल प्रोडक्ट नहीं था। “अर्माडा’ पुरानी हो चुकी थी। साल 2000 में आई “बोलेरो’ ने थोड़ी राहत जरूर दी, लेकिन वो भी गांव तक सीमित थी। हर तरफ से यह कहा जा रहा था कि महिंद्रा एंड महिंद्रा के टुकड़े हो जाएंगे और इसका ऑटो डिवीजन बंद हो जाएगा।

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