जिले के कस्बा बृज नगर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव डाबक पौराणिक दृष्टि से खासा महत्व रखता है। वर्तमान परिदृश्य में करीब 52 बीघा भूमि के आकार में फैले श्रवण ताल नामक स्थान की धार्मिक आस्था की अपनी अलग ही पहचान है। गांव के ही 85 वर्षीय वृद्ध हन्डू गुर्जर बताते है कि उक्त स्थान पर घनी संख्या में डाब (वन) फैला हुआ था और आसपास बडे, बड़े आकार की शिलाएं मौजूद थी। इसी स्थल के एक तरफ मौजूद तालाब की कहानी रामायण काल से जुड़ी हुई है। बताते है कि सेवल मंदिर स्थित चरण पहाड़ी से आकर श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता, पिता को तीर्थाटन (तीर्थ स्थल) के दौरान पानी पिलाया था। जिसपर दशरथ ने शिकार के दौरान पशु समझ उनपर बाण मारा था। तभी से तालाब का नाम श्रवण ताल पडा। यहां श्रवण कुमार के पदचिन्ह भी हैं। यहीं श्रवण कुमार के माता, पिता ने राजा दशरथ को श्राप दिया था। ग्रामीण मुकेश कुमार व राजेश ठेकेदार का कहना है कि श्रवण ताल का खासा महत्व यह है कि यहां प्रति वर्ष जलझूलनी एकादशी पर मेला भरता है। इस दौरान ग्रामीणों द्वारा ठाकुर जी का डोला निकालकर श्रवण ताल में स्नान कराने की प्राचीन परंपरा संचालित है। वही गांव पुनाय, सीकरी, बरसाना, पसोपा सहित आसपास के क्षेत्रों के ग्रामीण श्रवण कुमार व उनके माता, पिता की मूर्ति के दर्शन करने आते हैं। जबकि पुनाय व सीकरी के पंजाबी समुदाय की महिलाएं यहां संतान प्राप्ति की कामना करने आती है। श्रद्धालु श्राद्धपक्ष की पूर्णिमा, कार्तिक मास में श्रवण ताल में स्नान करने व नवरात्रा की समाप्ति पश्चात जौ विसर्जित करने आते है। संत के पढ़े हुए पानी से होती है पशुओं की पीडा दूर
ग्रामीण गजराज व सरपंच प्रतिनिधि गिर्राज सिंह बताते हैं श्रवण ताल में दो मंजिला मंदिर में मां गंगा, शिव परिवार, हनुमान व राधाकृष्ण की मूर्ति होने के साथ ही तपोनिष्ठ संत परमानन्द, प्रेमदास व गोपीदास महाराज की समाधि बनी है। पास में गुर्जर समाज के आराध्य देवनारायण व भूमिया बाबा का मंदिर मौजूद है। मंदिर महंत खेमदास द्वारा अभिमंत्रित ताल के पानी से पशुओं के थन व शरीर पर छिड़कने से पीडा मिटती है।


