फसल को तस्करों से बचाने किसानों ने लगवाए CCTV:पक्षी एक बार चख ले तो छोड़ते नहीं; कटाई से पहले होती है मां कालिका की पूजा

चित्तौड़गढ़ की एक फसल जिसे चुराने रात को तस्कर आते हैं। अगर कोई पक्षी इसे चख ले तो रोजाना इसी फसल पर मंडराने लगते हैं, खेत के खेत तबाह कर देते हैं। किसानों ने इसी चिंता को दूर करने के लिए अपने खेतों पर जाल लगाने शुरू कर दिए हैं। वहीं तस्करों से बचाने के लिए खेत में CCTV कैमरे लगा दिए हैं। सालों से इसकी खेती कर रहे किसान कहते हैं- ये काला सोना है। इसे बच्चे की तरह सहेज कर रखना होता है। अगर कम उत्पादन हुआ तो हमारा लाइसेंस भी रद्द हो जाता है। इस फसल को काटने से पहले कालिका मां की पूजा की जाती है। तौल भी सरकारी अधिकारियों के सामने किया जाता है। ये है अफीम की फसल, जिसे 30 दिन बाद काटा जाएगा। इसके बाद नारकोटिक्स विभाग की निगरानी में इसकी तुलाई होगी और किसानों को उनके दाम दिए जाएंगे। पढ़िए मेवाड़ इलाके में चित्तौड़गढ़ से उस नशे की खेती की रिपोर्ट जिसे सरकार की निगरानी में उगाया और बेचा जाता है- पढ़िए अफीम की खेती की पूरी कहानी… अफीम को चित्तौड़गढ़ की रबी की मुख्य नकद फसल माना जाता है। 1010 गांवों में 21 हजार 736 किसान मिलकर इस बार 1930.51 हेक्टेयर क्षेत्र में अफीम की खेती कर रहे हैं। खराबे से ज्यादा नुकसान तस्करों से 2016 से इसकी खेती कर रहे किसान संजय जैन (49) बताते हैं- जैसे ही पौधों पर डोडे आने लगते हैं, फसल का ध्यान छोटे बच्चों की तरह रखना पड़ता है। इसकी दिन-रात निगरानी जरूरी हो जाती है। अफीम को काला सोना भी कहते हैं। पहले किसान केवल कीट और मौसम की मार से डरते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में चोरी की घटनाएं भी बढ़ी हैं। डोडे कीमती होते हैं और थोड़ी सी लापरवाही कई महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है। यही कारण है कि किसान अब खेतों के चारों ओर तारबंदी, जाल और तरह-तरह के जुगाड़ करने लगे हैं। सबसे पहले मौसम की मार जैन बताते हैं- इस बार मौसम का संतुलन सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। पहले जहां सर्दियों में ठंड और गर्मियों में तेज धूप का एक तय क्रम रहता था, अब हर महीने बारिश होने लगी है। अचानक बदलते मौसम से अफीम के पौधों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है। तेज हवा और बारिश से पौधे गिर न जाएं, इसके लिए किसान मेढ़ बनाकर पौधों को सहारा देते हैं। खेतों में पौधे बांध कर रखते हैं। जैन बताते हैं- अफीम की फसल को कीड़े-मकोड़े और मच्छरों से बचाने के लिए पीले रंग के प्लास्टिक खेतों में लटकाते हैं, जिन पर गम लगाया जाता है। जैसे ही कोई कीट या मच्छर फसल के पास आता है, वह गम में चिपक जाता है। यह तरीका सस्ता भी है और असरदार भी। दवाओं से ज्यादा यह देसी उपाय काम करता है। पक्षी एक बार इसे चख ले तो बार-बार आते हैं जैन बताते हैं- अफीम के डोडे सिर्फ इंसानों के लिए ही आकर्षण नहीं होते, बल्कि तोता, तीतर और बटेर जैसे पक्षी भी इन पर बैठने आते हैं। अगर पक्षी एक बार अफीम चख लें, तो वे रोज खेत में आने लगते हैं। इससे डोडों को भारी नुकसान होता है। इसी वजह से कई किसान अब खेतों के ऊपर जाली लगवाने लगे हैं, ताकि पक्षी अंदर न आ सकें और फसल सुरक्षित रहे। खेतों में सीसीटीवी कैमरे जैन बताते हैं- अपनी फसल बचाने के लिए कई किसानों ने खेतों में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए हैं। इन कैमरों का सीधा कनेक्शन मोबाइल से होता है, जिससे किसान घर बैठे या कहीं बाहर से भी खेत पर नजर रख सकते हैं। रात में भी कैमरे के जरिए हर हलचल पर नजर रहती है। किसानों का कहना है कि कैमरे लगने के बाद चोरी की घटनाओं में काफी कमी आई है। फसल पर तस्करों की नजर रहती है। डोडे आने के बाद कई-कई रातों तक खेत में चौकीदारी करनी पड़ती है। चीरा लगाने से पहले कालिका मां की पूजा संजय जैन बताते हैं- 15 फरवरी से किसान डोडे पर चीरा लगाना शुरू कर देंगे। चीरा लगाने से पहले एक परंपरा निभाई जाती है। जिले के सभी अफीम किसान पहले दुर्ग स्थित कालिका माता मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। अधिकतर किसान रविवार का दिन शुभ मानते हैं। दर्शन के बाद पांच माता जी की मूर्तियां खेत में स्थापित कर पूजा की जाती है। इसके बाद ही डोडों में चीरा लगाया जाता है। अधिकारियों के सामने होती है पूरी कार्रवाई CPS पद्धति में डोडों को करीब दो महीने तक पौधों पर रखा जाता है। इसके बाद डोडों को डंठल सहित करीब 6 इंच तक तोड़ लिया जाता है और घर पर सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद इन्हें तौल केंद्र पर ले जाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया अधिकारियों की मौजूदगी में होती है, ताकि किसी तरह की गड़बड़ी न हो। अफीम औसत जमा करने पर ही मिलेगा लाइसेंस इस साल अफीम नीति के अनुसार मॉर्फीन की मात्रा 4.2 तय की गई है। इसके 2 तरीके हैं, एक सीपीएस और दूसरा गम पद्धति- मेवाड़ में होती है खेती खंड प्रथम के अफीम अधिकारी बी. एल. मीणा ने बताया कि चित्तौड़गढ़ जिले की चित्तौड़गढ़, बस्सी और भदेसर तहसील शामिल हैं। इसके साथ ही उदयपुर जिले की कानोड़, भिंडर, वल्लभनगर, मावली और लसाड़िया के गांव भी इसी डिवीजन में आते हैं। यहां एक पट्टा राजस्थान एग्रीकल्चर कॉलेज को एक्सपेरिमेंट के लिए भी दिया गया है। अधिकारियों की टीमें समय-समय पर खेतों की माप करती हैं और अतिरिक्त क्षेत्र में बोई गई फसल को नष्ट किया जाता है। कुल एरिया घटा लेकिन किसानों की संख्या बढ़ी इस बार कुल अफीम क्षेत्रफल 2071.71 हेक्टेयर से घटाकर 1930.51 हेक्टेयर कर दिया गया है। वहीं गांवों की संख्या 1007 से बढ़ाकर 1010 कर दी गई है। किसानों की संख्या भी बढ़ी है। पिछले साल 20 हजार 716 किसान थे, जबकि इस साल 21 हजार 736 किसान अफीम की खेती कर रहे हैं। वन टाइम क्रॉप है अफीम के पौधे किसान बताते हैं कि अफीम का पौधा वन टाइम क्रॉप होता है। एक पौधे में 5 से 7 डोडे आ सकते हैं, लेकिन ये सिर्फ एक बार ही आते हैं। डोडे तोड़ने के बाद पौधे में दोबारा डोड नहीं लगते। इसी वजह से उत्पादन के बाद इन पौधों को नष्ट कर दिया जाता है। विभाग बनाता है टीमें खंड प्रथम के अफीम अधिकारी बीएल मीणा ने बताया- राजस्थान में यह फसल चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, कोटा, झालावाड़ और बारां जिलों में बोई जाती है। जब पौधे बड़े हो जाते हैं, तब विभाग की ओर से अलग-अलग टीमें बनाई जाती हैं। इन टीमों में देश के अलग-अलग जिलों के अधिकारी शामिल होते हैं। ये टीमें किसानों के खेतों में जाकर जमीन की सही माप करती हैं। अगर किसी किसान ने तय क्षेत्र से ज्यादा जमीन में अफीम बोई होती है, तो उस अतिरिक्त क्षेत्र की फसल को वहीं नष्ट कर दिया जाता है।

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