भास्कर न्यूज | बैकुंठपुर कोरिया जिले के बैकुंठपुर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत अमरपुर में होली का उत्सव पूरे देश से अलग और अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। जब पूरी दुनिया में लोग होली की तैयारियों में जुटे होते हैं, तब अमरपुर के ग्रामीण त्योहार मना चुके होते हैं। यहां तय तिथि से छह दिन पहले ही होलिका दहन और धुरेड़ी (रंग-गुलाल) की परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा दशकों नहीं बल्कि सैकड़ों वर्ष पुरानी है। ग्रामीणों के अनुसार, प्राचीन काल में जब इस गांव का नाम लिटियामार हुआ करता था, तब होली के आसपास गांव में बीमारियां और महामारी फैल जाती थी। असमय मौतों और आपदाओं से घबराकर ग्रामीणों ने स्थानीय बैगा और देवताओं की शरण ली। मान्यता है कि बैगा के परामर्श पर गांव का नाम बदलकर अमरपुर किया गया और तभी से सभी प्रमुख त्योहारों को 6 दिन पहले मनाने की शुरुआत हुई। बुजुर्ग ग्रामीण रामअवध सिंह बताते हैं कि उन्होंने भी पूर्वजों से यही सुना है कि इस बदलाव के बाद से गांव में कभी कोई बड़ी विपत्ति नहीं आई। आज गांव के 90% युवा शिक्षित हैं और उनके हाथों में एंड्रॉयड मोबाइल है, लेकिन अपनी संस्कृति के प्रति उनकी आस्था कम नहीं हुई है। इस वर्ष 24 फरवरी की रात को होलिका दहन किया गया। 25 फरवरी को सुबह गांव के बुजुर्गों ने राख उड़ाकर परंपरा निभाई। एक दशक पहले तक यहां ढोल, नगाड़ों और फाग गीतों की गूंज होती थी, लेकिन अब युवा डीजे की धुन पर थिरकते नजर आते हैं। दोपहर 12 बजे तक गांव में शांति रहती है, जिसके बाद युवाओं की टोलियां एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले पहुंचकर अबीर-गुलाल लगाती हैं। अमरपुर की यह होली अब केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि गांव की विशिष्ट पहचान और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक बन चुकी है। ग्रामीणों का मानना है कि परंपराओं का पालन ही उन्हें आपदाओं से सुरक्षित रखता है।


