प्रदेश में चावल की अनेक प्रजातियां हैं। इनमें कई ऐसी किस्में हैं, जिनमें औषधीय गुण हैं। साथ ही वे कई बीमारियों से लड़ने में कारगर हैं। ऐसी ही विलुप्त हो रही चावल की प्रजातियों को सहेजने और उनमें औषधीय गुणों की खोज करने के उद्देश्य से एग्रीकल्चर कॉलेज की एक पीएचडी स्कॉलर ने महाराजि चावल पर शोध किया है। इस शोध से महाराजि म्यूटेंट-2 नामक किस्म का निर्माण हुआ है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) के एग्रीकल्चर कॉलेज की पीएचडी स्कॉलर की इस खोज में यह भी पता चला है कि यह चवाल एनीमिया के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद हैं। डॉ. अंतरा थाडा, (डीएसटी इंस्पायर फेलो, स्वर्ण पदक विजेता, पीएचडी छात्रा) ने प्रोफेसर दीपक शर्मा के मार्गदर्शन में पारंपरिक धान की किस्मों, विशेष रूप से महराजि चावल पर गहन शोध किया। डॉ. थाडा ने इस चावल की विशिष्ट सुगंध और औषधीय गुणों के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को उजागर करने का प्रयास किया। चावल में उपस्थित यौगिकों की पहचान के लिए किया शोध डॉ. अंतरा ने बताया कि शोेध की शुरुआत 2020 से हुई और 2024 अंत में खत्म हुई। 13-14 वैरायटीज पर काम किया। बीआरसी में इनकी स्क्रिनिंग की। फाइटोकेमिकल्स के फायदे जानने लैब में टेस्ट किया। काफी किस्मों में हमें एंटीऑक्सीडेंट प्रॉपर्टीज मिली हैं। इनमें लायचा, गुड़मा और महाराजिन में मिले। इसमें महाराजिन में काफी एंटीअॉक्सिडेंट पाए गए। मेटाबोलोमिक्स तकनीक से महराजि चावल की जैव रासायनिक संरचना का सूक्ष्म विश्लेषण किया। इसमें चालीस प्रमुख यौगिकों की पहचान की गई, जिनमें टर्पीन, फ्लेवोनोइड्स और अमीनो एसिड आदि शामिल हैं। इन यौगिकों के कारण ही इस चावल की प्रजाति में विशिष्ट सुगंध आता है। डॉ. थाडा का यह शोध एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनके इस शोध से महराजि चावल की मनमोहक सुगंध और उसमें स्थित विशिष्ट यौगिकों की पहचान हुई है। उनका यह शोध ‘फूड केमिस्ट्री’ नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोध के दौरान उन्होंने इसे एनमिया के मरीजों को खिलाया। तब पता चला कि चावल एनिमिया में फायदेमंद है। इस चावल के उपयोग से हिमोग्लोबिन का निर्माण होता है।


