वेटर की नौकरी कर वकील बनीं रतनी, अब माझियों की आवाज बनेंगी

लव दुबे | अंबिकापुर माझी जनजाति की रतनी नाग संघर्ष की मिसाल बन गई हैं। अपनी और अपने समाज की जमीन बचाने के लिए रतनी मे वकालत की। पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे, तो होटल में रातभर वेटर की नौकरी की। वकील बनने के बाद जनजातियों के लिए मुफ्त में केस लड़े। अब मैनपाट क्षेत्र से चुनाव जीतकर जिला पंचायत सदस्य बनी हैं। रतनी नाग मैनपाट के बरिमा गांव की रहने वाली हैं। इलाके में माझी जनजाति के लोगों की स्थिति आज भी अच्छी नहीं है। रतनी ने इस बदहाली से निकलकर समाज के लिए नई राह बनाई। रतनी राजनीति में आने से पहले ही वकील बनने के संघर्ष के कारण सुर्खियों में आ गई थीं। 12वीं कक्षा के बाद कॉलेज में एडमिशन के लिए परिवार के पास पैसे नहीं थे। गांववालों से 20 से 50 रुपए तक चंदा जुटाया। फिर भी 200 रुपए कम पड़ गए, तो हताश हो गईं। इस दौरान बाजार में एक पंपलेट मिला, जिसमें बालको में नौकरी देने की जानकारी थी। मोबाइल नहीं था, तो सरपंच से फोन मांगकर कॉल किया। ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया। तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद बिलासपुर के होटल में वेटर का काम मिला, जो पैसा मिलता, उससे फीस जमा की। सुबह कॉलेज जातीं और दोपहर से रात तक होटल में काम करतीं। अब रतनी नाग माझी जनजाति की जमीन और अधिकारों के लिए हाई कोर्ट में मुफ्त में केस लड़ती हैं। रतनी नाग माझी जनजाति से है, जिसे मैनपाट का मूल निवासी माना जाता है। 42 पंचायतों वाले पठारी इलाके वाले मैनपाट के ज्यादातर पंचायत माझी मझवार बहुल हैं। आज भी यह समाज ​िपछड़ा हुआ है। इसकी वजह अशिक्षा और नशे का आदि होना है। इस समाज की रतनी ने यहां तक पहुंची हैं। रतनी समाज के लोगों में जागरुकता के लिए भी काम कर रही हैं। राजनीति में आने के सवाल पर रतनी ने कहा कि माझी मझवारों की पीड़ा देखी नहीं जाती। मैं भी इसी समाज से हूं। गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को करीब से देखा है। माझी जनजातियों में शिक्षा का स्तर काफी कम है। आठवीं कक्षा के बाद बच्चे पढ़ाई नहीं करते, क्योंकि उनका स्थाई निवास प्रमाण-पत्र नहीं बनता। शब्दों में त्रुटि के कारण यह समस्या बनी हुई है। मैनपाट के 23 पंचायतों से जीतकर जिला पंचायत में पहुंची हूं। यह माझी बहुल इलाका है और पूरे इलाके की यही कहानी है। बतौर जिला पंचायत सदस्य माझियों की आवाज बनूंगी। बाबू ने घूस मांगी तो रतनी नाग ने वकील बनने की ठानी रतनी नाग ने बताया कि गांव के लोगों ने उनके पिता को शराब पिलाकर जमीन पर खदान खुलवा दी। खेती बंद हो गई। जब वे सीतापुर एसडीएम ऑफिस में जाति प्रमाण-पत्र और जमीन के कागज निकलवाने गईं, तो बाबुओं ने घूस मांगी। नियम-कानून बताकर सात महीने तक चक्कर कटवाए। इससे परेशान होकर कुछ करने की ठानी। एसडीएम ऑफिस में ही वकील के बारे में सुना। बिलासपुर लौटकर मोबाइल पर सर्च किया कि वकील कैसे बनते हैं। कॉलेज में संपर्क किया, लेकिन मोटी फीस सुनकर वापस आ गईं। इसके बाद हार नहीं मानी और वकील बन गईं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *