इतने डरे जूनियर:शिकायत को तैयार नहीं क्योंकि पांच साल के लिए अछूत हो जाएंगे

प्रशासन की टीम पहुंची तो 35 मिनट तक प्रभारी डीन और वार्डन आए ही नहीं एमजीएम मेडिकल कॉलेज के बॉयज होस्टल में रैगिंग को लेकर भास्कर खुलासे के बाद बुधवार को प्रशासन की टीम होस्टल पहुंची। सूचना देने के बाद भी टीम के पहुंचने के आधे घंटे बाद प्रभारी डीन और चीफ वार्डन पहुंचे। होस्टल के आठ ब्लॉक में सिर्फ एक गार्ड मिला। किसी को नहीं मालूम कि कैमरे चालू हैं या नहीं, रिकॉर्डिंग के बारे में भी कुछ पता नहीं। उधर, घटना से छात्र इतने डरे हुए हैं कि सोशल मीडिया पर आपबीती साझा करने के बाद कोई शिकायत को तैयार नहीं हुआ। अफसरों ने जब सवाल उठाए तो प्रो. सुमित्रा यादव ही बोलीं, छात्र डरते हैं कि यदि शिकायत कर दी तो पांच साल उनसे अछूत जैसा व्यवहार होगा। टीम ने प्रभारी डीन डॉ. निलेश दलाल से 15 सितंबर से अब तक के सीसीटीवी फुटेज, सुरक्षा गार्ड व वार्डन का रोस्टर मांगा है। कॉलेज प्रशासन के रवैये पर एसडीएम निधि वर्मा नाराज भी हुईं। 40 छात्र होस्टल छोड़ चुके-मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस का बैच अक्टूबर में आया। करीब 100 बच्चों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। बताते हैं, 40 छात्र होस्टल छोड़ चुके हैं। ये कॉलेज की एंटी रैगिंग कमेटी… दो साल से नाम ही नहीं बदले {होस्टल के हर ब्लॉक के बाहर एंटी रैगिंग स्कवॉड के बोर्ड तो लगे हैं, लेकिन दो साल से इन्हें अपडेट ही नहीं किया। चेयरमैन डॉ. अनिता मूथा और सदस्य डॉ. पीएस ठाकुर अब इंदौर में पदस्थ ही नहीं हैं। डॉ. एके खत्री रिटायर हो चुके हैं। टीआई तहजीब काजी का तबादला कन्नौद हो चुका है। उधर, मानवाधिकार आयोग ने भी तीन हफ्तों में मामले की पूरी रिपोर्ट मांगी है। भास्कर से बोले छात्र }10 नवंबर से ही परेशान करने लगे थे सीनियर छात्रों ने भास्कर को बताया, 10 से 20 अक्टूबर के बीच सभी छात्र होस्टल आए। पांच-छह दिन सब ठीक था। फिर एक दिन दो सीनियर आए। मजाक-मस्ती की और चले गए। सीनियर फिर रात को आए। लाइट बंद कर दी। सबके फोन ले लिए। वे मफलर बांधकर आए थे, इसलिए चेहरा नहीं देख पाए। ट्यूबलाइट भी फोड़ दी। हमें ब्लॉक नंबर 7 ले गए। वहां बेडमिंटन कोर्ट में खड़ा किया। शुरू में मारा नहीं, डराया। फिर हर तीन-चार दिन में यह होने लगा। एक ही कपड़े में रहना पड़ता था। गलती पर चांटा भी मारा। रात 2 बजे तक नहीं सोने देने जैसी शर्त रखी जाती थी। जिस दिन बुलवाते थे, सुबह 5 बजे तक खड़ा रखते थे। कई बार शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक खड़ा रखा। यहां आए हो तो सहन करना ही होगा… इस तरह की घटना और रैगिंग का शिकार मेरा बेटा और उसके साथी भी हुए। एक बच्चे के तो सिर पर सीनियर्स ने ट्यूबलाइट ही फोड़ दी। चांटे मारे। हमने शिकायत की तो अगले दिन क्लास में प्रोफेसर बोले, यहां आए हो तो इतना तो सहन करना ही पड़ेगा। हमने अपने बच्चों को डॉक्टर बनने भेजा है, खुदकुशी करने नहीं।
-जैसा एक छात्र की मां ने भास्कर को बताया कई बार बच्चे डर के कारण नहीं बोलते ^नवंबर में मेरे पास मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया था। उसमें इसी तरह की प्रताड़ना की बात कही गई थी। चीफ वार्डन डॉ. वी.एस. पाल को जांच के लिए कहा था, लेकिन किसी बच्चे ने स्वीकार नहीं किया। सभी को अकेले में बुलवाकर भी पूछा था। – डॉ. संजय दीक्षित, पूर्व डीन
कुछ तथ्य और कई कमियां सामने आई हैं छात्रों से एक-एक कर बात की गई है। 59 छात्रों से बात हाे रही है। कुछ फैक्ट्स सामने आए हैं। वहां कई कमियां मिली हैं। सीसीटीवी की व्यवस्था नहीं मिली। सुरक्षा भी नहीं थी। आठ ब्लॉक है और एक सिक्योरिटी गार्ड हैं। हमने छात्रों को अपने नंबर भी शेयर किए हैं। – शिवशंकर धनौरिया, तहसीलदार

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