नियमों को लागू करने के लिए हर स्तर पर लिंक स्थापित होना चाहिए

भास्कर न्यूज| लुधियाना नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) के जरिए प्री-नर्सरी से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई में बदलाव के प्रयास किए जा रहे हैं। सेंट्रल बोर्ड हो या यूजीसी, एआईसीटीई जैसे राष्ट्रीय स्तर के संस्थान एनईपी को ही केंद्र में रख कर निर्देश जारी कर रहे हैं। हालांकि राज्य स्तर पर इसे लागू करने में अभी भी चर्चाएं और विचार चल रहा है। लेकिन शिक्षाविदों की मानें तो एनईपी को अगर एकसारता से लागू किया जाए तो स्टूडेंट्स के विकास में यह पॉलिसी मददगार होगी। यूके, यूएसए, न्यूजीलैंड, जर्मनी से कहीं बेहतर हमारा एजुकेशन सिस्टम है और वहां के बच्चों को एक क्लास पीछे एडमिशन दी जाती है। शिक्षाविदों के अनुसार एनईपी में फाउंडेशनल स्टेज यानि 3-6 साल के बच्चों की एक्टिविटी और एक्सपीरिएंशल (अनुभव आधारित) लर्निंग को प्रोत्साहित किया गया है। जोकि सराहनीय कदम है। हर उम्र के मुताबिक और हर बच्चे पर फोकस करने की इस पॉलिसी से आने वाले समय में काफी मदद मिलेगी। प्री-नर्सरी से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई के क्रेडिट, स्किल एजुकेशन को बढ़ावा, उच्च शिक्षा में पढ़ाई के बीच में गैप देने पर भी कोर्स के अनुसार सर्टिफिकेट, वर्क एक्सपीरियंस का भी लाभ जैसे कई फायदे हैं। जागरुकता की कमी के कारण और इस पॉलिसी के लागू होने में हो रही देरी के कारण इसे लागू होने में समय लग रहा है। वहीं, स्टूडेंट्स और पैरेंट्स तक भी जानकारी पूरी पहुंचनी बाकी है। स्किल एजुकेशन को बढ़ावा दें, पैरेंट्स व अध्यापकों को एक साथ बेहतर भविष्य के लिए काम करना होगा गुरभेज सिंह नागी प्रिंसिपल गुरु नानक पब्लिक स्कूल सराभा नगर, पवनदीप सिंह ढिल्लों डायरेक्टर बडिंग ब्रेन स्कूल रायकोट, रुपाली कटारिया प्रिंसिपल बाबा ईशर सिंह पब्लिक स्कूल, हरनीत सिंह प्रिंसिपल पोदार इंटरनेशनल स्कूल, ​गिनाक्षी कपूर प्रिंसिपल स्प्रिंग बैल्स पब्लिक स्कूल ने शिरकत की। इसी विषय पर शिक्षाविदों से चर्चा के लिए दैनिक भास्कर द्वारा फोकस्ड ग्रुप डिस्कशन (एफजीडी) गुरु नानक पब्लिक स्कूल सराभा नगर में आयोजित की गई। शिक्षाविदों के अनुसार नेशनल एजुकेशन पॉलिसी को प्रभावशाली ढंग से लागू करने के लिए केंद्र, राज्य, स्कूलों, पैरेंट्स को सम्मिलित करने की जरुरत है। शिक्षाविदों द्वारा स्कूलों और अध्यापकों के लिए बदल रहे व्यवहार, सरकारी स्कूलों में भी एनईपी को लागू करने, सोशल मीडिया के स्टूडेंट्स में बढ़ रहे प्रयोग, पढ़ाने के पारंपरिक तरीके, बीएड कॉलेज में पढ़ाने की कम हो रही गंभीरता, स्किल एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी सिस्टम को भी मजबूत करने जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे। साथ ही सीबीएसई द्वारा एनईपी को लागू करने के लिए उठाए जा रहे कदमों जैसे टीचर ट्रेनिंग, एसक्यूएएएफ के अलावा इंटरनेशनल एजुकेशन सिस्टम पर भी चर्चा की। स्टूडेंट्स को प्रैक्टिकल जानकारी देने के लिए ट्रेनिंग देने की जरुरत है। शिक्षाविदों के मुताबिक पैरेंट्स को अपनी पेरेंटिंग में भी बदलाव लाना होगा। जिससे कि बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जा सके। बच्चों को अगर रटाएंगे तो वो भूलेंगे। अगर हर चीज को याद करवाने के लिए एक्टिविटी होगी तो कभी नहीं भूलेंगे। जैसे पीले रंग के बारे में सिखाने के लिए एक खिलौने के लिए पीले कपड़े, गैजेट, फूड इत्यादि तैयार करने के लिए कहेंगे तो वो हमेशा पहचान रखेंगे। टीचर ट्रेनिंग के साथ ही बच्चों की स्किल्स पर फोकस होना चाहिए। सिखाने के लिए छोटे-छोटे कदम और प्लानिंग जरूरी होती है। गिनाक्षी कपूर , प्रिंसिपल, स्प्रिंग बैल्स पब्लिक स्कूल हेल्दी कंपीटिशन को बढ़ाने के लिए काम हो एनईपी में फाउंडेशनल स्टेज को काफी प्रमुखता दी गई है। नर्सरी क्लास के बच्चों के लिए किस तरह की स्किल जरूरी है इसमें यह भी बताया गया है व उन्हें भविष्य के लिए तैयार किया जा सकता है। एनईपी को लागू करने में अभी काफी गैप है। इसे केंद्र से लेकर राज्य तक लागू करने के लिए मिल कर काम करना होगा। अगर आंध्र प्रदेश की बात करें तो वहां प्राइवेट-प्राइवेट का नहीं बल्कि प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर में कंपीटिशन है। इसी तरह का कंपीटिशन यहां भी तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए। -हरनीत सिंह, प्रिंसिपल, पोदार इंटरनेशनल स्कूल सोशल मीडिया बच्चों को समय से पहले मानसिक तौर पर विकसित कर रहा है। वहीं, वेपिंग का कल्चर बहुत बढ़ गया है जो बच्चों की सेहत को भी खराब कर रहा है। लेकिन कई बार पैरेंट्स भी इसे सपोर्ट करते हैं। जो गलत है। स्कूलों की लगातार बढ़ रही संख्या पर भी रोक लगाने की जरुरत है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता भी नहीं बन पाती। रुपाली कटारिया, प्रिंसिपल, बाबा ईशर सिंह पब्लिक स्कूल 12वीं के बाद स्टूडेंट्स अपने लिए सही करियर अपनी स्किल के अनुसार चुन सकें यह अहम है। शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने में अध्यापकों के साथ पैरेंट्स और स्टूडेंट्स को भी सहयोग देना होगा। पैरेंट्स हर छोटी बात के लिए भी अध्यापकों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं और गलत बोलते हैं।

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