प्रदेश में जानवरों की गिनती 31 मार्च तक हो जाएगी। गाय-बैल, भैंस, कुत्ते, घोड़े, खरगोश, बकरे-बकरी इत्यादि घरेलू जानवरों की गिनती चल रही है। संकेत मिले हैं कि गायों की संख्या कम हो सकती है। इसके उलट बकरे-बकरियों की संख्या बढ़ी है। गधे विलुप्ति की कगार पर हैं। गांवों में गिनती कर रहे गणकों का मानना है कि गाय-भैंसों का पालना अब कठिन हो रहा है। परिवारों में पैतृक संपत्ति के बंटवारे से भी इन्हें पालने के लिए जगह की कमी हो रही है। बंटवारे में घर के गोठान और पैरा रखने की जगह भी खत्म होती जा रही है। इनसे आय कम और खर्च ज्यादा हो रहा है। इन्हीं वजहों से लोग गाय-भैंस नहीं पाल रहे हैं। जिनके पास हैं, वे इन्हें सड़कों पर खुले में छोड़ देते हैं। प्रदेश में 21 हजार से ज्यादा गांव हैं। इनमें लगभग 15 हजार ट्राइबल बेल्ट में हैं। वेटेरनरी विभाग के अनुसार पिछली बार 2019 में राज्य में 90 लाख गायें और 11.76 लाख भैंस थीं। इन दोनों के ही कम होने के संकेत हैं। हालांकि अभी गिनती पूरी होनी बाकी है। बकरे-बकरियों की संख्या लगभग 40 लाख थी। हर सात साल में एक बार पशुपालन विभाग करता है पशु गणना, 31 मार्च तक चलेगी गिनती कितनी साइंटिफिक प्रदेश में हर सात साल में पशुओं की गिनती होती है। पशु पालन विभाग के डॉक्टर, अधिकारी कर्मचारी इसमें लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में एक टीम को 5-7 गांव में गिनती करनी है तो शहरों में 8-9 वार्ड में जाना है। हर जानवर के कानों में टैग (पीला बिल्ला) लगाकर उसकी पहचान तय की जा रही है। इस टैग को स्कैन करने पर उस जानवर की हिस्ट्री यानी उसकी नस्ल, नर या मादा, उम्र, बच्चे जने हैं या नहीं, इलाज की जानकारी, दूध देती है या नहीं, ब्रीड आदि सामने आ जाती है। प्रदेश में 95 फीसदी पशुओं की टैगिंग कर रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है। पशु बाजारों की जरूरत संगणकों को गांव वाले बताते हैं कि वे तो गाय पालना चाहते हैं, लेकिन प्रदेश में पंजाब, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान जैसे पशु बाजार नहीं लगते। इस वजह से यहां महंगे पशु मिलते हैं। इनको खरीदने ऋण लेने की सुविधा भी आसान नहीं है। जबकि किसान के लिए गाय-बैल-भैंस महत्वपूर्ण हैं। यहां तक कि छत्तीसगढ़ में तीज-त्योहार गाय के बिना संपन्न नहीं होते। हरेली, गोवर्धन पूजा, तीजा-पोरा, कृष्ण जन्माष्टमी, नवा खाई, अन्नकूट, मातर, एकादशी, आदि बिना गौ-माता की पूजा के पूरे नहीं होते हैं। प्रमुख बातें {गांवों में मेड़ों पर चारे की कमी {बनिहार प्रथा भी सिमटती जा रही {चारागाह-गोठान कम हो रहे {खेती का रकबा बढ़ रहा {मशीनों से काम की वजह से जानवरों की कमी {बरसात के बाद स्वयमेव उगने वाले चारे की भी कमी {गांवों में पशु सखी केंद्रों की जरूरत {चरवाहे और गो सेवक, गो-भक्तों मानदेय की जरूरत ताकि चरवाहे बरवाही प्रथा से मुक्त हो सकें {दूध उत्पादन में बरसों से बढ़ोतरी नहीं।


