भास्कर न्यूज | सुकमा जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं धीरे-धीरे ठप होती चली जा रही हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां बीते डेढ़ साल से एक भी अस्थिरोग विशेषज्ञ नहीं है। यहां पदस्थ रहे अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश के सेवानिवृत्त होने के बाद अब तक यहां दूसरे डॉक्टर की नियुक्ति नहीं हो सकी है। वहीं, एक साल से जिला अस्पताल में सोनोग्राफी भी बंद है। इसके पीछे का कारण रेडियोलॉजिस्ट की कमी बताया जा रहा है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि अस्थिरोग विशेषज्ञ और रेडियोलॉजिस्ट की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया है, लेकिन नक्सल प्रभावित जिला होने के कारण यहां कोई आना नहीं चाहता, और जो आना चाहते हैं, वे कहीं ज्यादा वेतन मांग रहे हैं। अस्पताल में सोनोग्राफी बंद होने से गर्भवती महिलाओं के साथ सामान्य मरीजों को भी कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जिला अस्पताल पहुंचने वाली गर्भवती महिलाओं की जांच स्त्रीरोग विशेषज्ञ करते हैं, लेकिन सोनोग्राफी केवल गर्भवती महिलाओं के लिए नहीं होती। पेट संबंधी बीमारियों के साथ छोटे बच्चों की भी सोनोग्राफी होती है, और बीमारी का इलाज बिना सोनोग्राफी के संभव नहीं है। डॉक्टर मरीजों को निजी अस्पताल या क्लीनिक भेज रहे हैं, जिससे मरीजों को जगदलपुर, ओडिशा के मलकानगिरी, आंध्रप्रदेश-तेलंगाना तक की दौड़ लगानी पड़ रही है। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. एमआर कश्यप बताते हैं कि अस्थिरोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट समेत अन्य विशेषज्ञों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां कोई आना नहीं चाहता। दो साल पहले सुकमा जिला अस्पताल में मिल रही हाईटेक स्वास्थ्य सुविधाएं पूरे बस्तर में चर्चा का विषय थी। दीगर राज्यों से भी मरीज यहां इलाज करवाने पहुंचते थे, लेकिन अब जिला अस्पताल की स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराती चली जा रही हैं। नक्सल प्रभावित जिले में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरने के बजाय बदहाल होती चली जा रही हैं। अस्थिरोग विशेषज्ञ की कमी के कारण सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। समय पर इलाज न मिल पाने के कारण उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद रिफर करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इस हालात में मरीज मजबूरी में निजी अस्पतालों में मोटी रकम चुकाकर इलाज करवाने को मजबूर हैं।


