मऊगंज के गडरा गांव में 15 मार्च को हुई भयावह हिंसा की तस्वीरें अब तक दिमाग से छटी भी नहीं थी कि एक और डरा देने वाली घटना गांव में हो गई। 5 अप्रैल की रात फिर वही सन्नाटा डर बनकर गांव की गलियों में उतर आया। एक ही घर में तीन लाशें मिलीं- पिता, बेटे और बेटी की। शव सड़ने लगे थे। दरअसल, पिछले करीब 20 दिनों में प्रशासन ने गांव में सुकून और व्यवस्था की चादर तानने की कोशिश तो की, लेकिन इन तीन शवों के मिलने से यह तो स्पष्ट हो गया कि गडरा गांव में “अब तक सब कुछ ठीक नहीं है।” घटना के बाद शुक्रवार रात दैनिक भास्कर की टीम उसी गडरा गांव पहुंची। हमारी मंशा थी- उस मौन की तह तक जाना, जो दिन के तमाशे के बाद रात के साए में और गहरा हो जाता है। पढ़िए, गड़रा गांव की यह रिपोर्ट… कलेक्टर-एसपी और एएसपी पहरा देते मिले
रीवा से भास्कर टीम मऊगंज के लिए निकली, तब घड़ी रात के 8 बजा रही थी। रात करीब 10.30 बजे गडरा पहुंचे तो गांव के मुहाने पर सन्नाटा पसरा था। कुछ दूर इक्का-दुक्का लाइट उस सन्नाटे को चीर रही थी। टीम गांव के भीतर दाखिल हुए तो यहां पुलिस का जमघट था। पुलिस की टीम एक छोटे से मैदान में डटी थी, पास पहुंचे तो देखा पूरा-पुलिस-प्रशासन मौके पर ही है। इनमें कलेक्टर संजय जैन, मऊगंज एसपी दिलीप सोनी और एडिशनल एसपी विक्रम सिंह शामिल थे। गांव के पहरे पर करीब 50 पुलिसकर्मी- क्यूआरएफ, जिला पुलिस और 25वीं बटालियन के गार्ड्स तैनात थे। भास्कर टीम के इतनी रात में पहुंचने पर सभी की निगाहें इसी ओर टिक गईं। टीम ने सबसे पहले वहां तैनात पुलिसकर्मियों से गांव के हालात के बारे में पूछा। जवाब मिला- स्थिति तनावपूर्ण है। हम पीड़ित परिवार से मिलना चाहते थे, लेकिन इतनी रात को बगैर पुलिस के इजाजत परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। हम एएसपी विक्रम सिंह के पास पहुंचे और गांव में भीतर जाकर पीड़ित परिवार से मिलने देने की इजाजत मांगी। हमने उन्हें बताया कि पीड़ित परिवार से हमारी बात हो चुकी है और वे हमसे मिलना चाहते हैं। हमारे निवेदन को उन्होंने ठुकराते हुए साफ शब्दों में कहा, हालात ठीक नहीं है। आपकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। हमने आग्रह किया, हम अपने जोखिम पर जाना चाहते हैं। एएसपी विक्रम सिंह ने हमारी बात को ध्यान से सुना और बोले- आप कलेक्टर साहब से अनुमति लीजिए। हम कलेक्टर संजय जैन के पास पहुंचे। कलेक्टर और एसपी दिलीप सोनी एक ही वाहन में साथ बैठे हुए थे। हमने उसने निवेदन किया तो बोले- एसपी सर से भी एक बार बात कर लीजिए। एसपी दिलीप सोनी ने हमने कहा- परिजन बहुत आक्रोशित हैं, रात में जाना जोखिम भरा हो सकता है, यदि आप खुद की जिम्मेदारी पर जाना चाहते हैं, तो हम आपको नहीं रोकेंगे। एसपी सोनी की बात सुनकर हमने सिर हिलाते हुए कहा- हम तैयार हैं। उनकी परमिशन मिलने के बाद हम पीड़ित परिवार से मिलने उनके घर की ओर बढ़ गए। फॉरेंसिक जांच के कारण घर सील
अंधेरी गलियों से होते हुए हम करीब 200 मीटर पैदल चले ही थे कि सामने वह मकान नजर आया, जहां शुक्रवार को तीन लाशें मिली थीं। बेटा-बेटी और पिता की। बताते हैं, लाशें सड़ने लगी थीं। गली के किनारे पर इस मकान के बाहर एक बल्ब हल्की पीली रोशनी बिखेर रहा था। फॉरेंसिक जांच के कारण घर को पुलिस ने सील कर रखा था। घर बंद देखकर हमने मृतक की रिश्तेदार विद्यावती को फोन किया। रीवा से निकलने से पहले हमने विद्यावती से ही बात की थी। उन्होंने बताया- सभी लोग उन्हीं के घर पर हैं। हमें वहीं आने को कहा। विद्यावती ने हमें फोन पर ही रास्ता बताना शुरू किया। करीब 300 मीटर और चलने पर एक कच्चे मकान के सामने पहुंचे। दरवाजा आधा खुला था, भीतर का जो दृश्य था, वह शब्दों से परे था। दो महिलाएं जोर-जोर से रो रही थीं… उनकी आंखों से जैसे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। हम भीतर पहुंचे तो दोनों डबडबाई आंखों से हमें देखने लगीं। एक छोटा बच्चा खाट पर बेसुध सा पड़ा था, और दूसरा मां की गोद में सिसकियां ले रहा था। अचानक से रोने की आवाजें तेज हो गईं, सबकी आखों से आंसू बहने लगे। विद्यावती ने बताया कि जिनकी मौत हुई है, वो मेरे जेठ थे। ये दोनों उनकी बेटियां हैं। उस गमगीन माहौल में हमारे लिए बात करना मुश्किल था। विद्यावती के साथ मिलकर हमने उन्हें समझाने की कोशिश की। 20 दिन से पुलिस, फिर भी मामला दबा रहा
हमने विद्यावती साकेत से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बात शुरू की तो उसकी आंखों में गुस्सा उतर आया। बोली- सबसे पहले मैंने ही गांव के लोगों को बताया था कि उस बंद पड़े घर से तेज दुर्गंध आ रही है। ये बदबू सामान्य नहीं थी, चार दिन पहले से मोहल्ले में फैल रही थी, लेकिन लोगों ने डर के मारे कहने की जहमत नहीं उठाई। गांव में 20 दिनों से पुलिस के करीब 30 जवान तैनात हैं। हर गली, हर मोड़ पर पैनी निगाहें, हर सरसराहट पर चौकन्ना पहरा… लेकिन जिस घर से लाश की दुर्गंध उठ रही थी, उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। सब जानते थे-कुछ न कुछ अनहोनी हो चुकी है, फिर भी चार दिन तक मामला घसीटा गया। पहले तो पुलिस ने हर बात पर सख्ती दिखाई, लेकिन अब जब मामला खुलने की कगार पर था, तो वही पुलिस बदनामी के डर से आंखें मूंदे बैठी रही। ऐसा लग रहा था जैसे जानबूझकर कुछ न देखने और न सुनने की कसम खा रखी हो। उन्होंने बताया कि आखिरकार हमने एक जनप्रतिनिधि का सहारा लिया। गुहार लगाई और विनती की, तब जाकर पुलिस हरकत में आई। दरवाजा खुला और भीतर जो दिखा, उससे हमारी रूह कांप गई। जो पुलिस सुई गिरने की आवाज तक सुन लेती है, जो हर छोटी से छोटी गतिविधि पर चौकसी रखती है… क्या उसने चार दिन से उठ रही इस दुर्गंध को महसूस नहीं किया होगा? या फिर इसके पीछे कोई सोची-समझी साजिश थी, जिस कारण इसे अनदेखा किया जाता रहा? गडरा में अब तक कुल तीन घटनास्थल- दो तारीख, एक जैसी क्रूरता हत्या और आत्महत्या के पीछे पुलिस और परिवार के तर्क परिवार हत्या की यह वजह बता रहा… आत्महत्या के पीछे पुलिस का तर्क… पूरे इलाके में सख्ती से हो रही थी पूछताछ
5 अप्रैल को जिस घर से एक साथ पिता, बेटे और बेटी की लाशें बरामद हुईं, यहां से सिर्फ 100 मीटर दूरी पर ही 15 मार्च को एएसआई रामचरण गौतम पर जानलेवा हमला किया गया था। दरअसल, यह प्वांइट पुलिस-प्रशासन की खास निगरानी में था। पुलिस की पैनी नजर हर उस घर और व्यक्ति पर थी, जो इस परिधि में आता था। घटनास्थल के इर्द-गिर्द रहने वालों से सख्ती से पूछताछ की जा रही थी। इसलिए जब तीन शव उसी संवेदनशील क्षेत्र से बरामद हुए, तो सवाल और भी गंभीर हो गए। औसेरी साकेत के परिजनों ने डरते-डराते कहा कि हमारा घर भी उसी क्षेत्र में है। लिहाजा सख्ती से पूछताछ हो रही थी। परिजनों को नहीं पता- शव कहां ले गए थे
घर से एक साथ तीन शव बरामद होने के बाद भी परिजनों को यह तक नहीं बताया गया कि उनके प्रियजन-पिता, बेटा और बेटी के शव आखिरकार कहां ले जाया गया। पूरा परिवार असमंजस में था कि क्या शव मऊगंज भेजे गए, या फिर रीवा ले जाया गया? हालांकि अगले दिन पुलिस शव को वापस गांव लेकर पहुंची, जहां काफी समझाइश के बाद परिजनों ने अंतिम संस्कार किया। विद्यावती और पवन साकेत की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा, जब पुलिस शव को लेकर जा रही थी, तब साथ किसी भी परिजन को लेकर नहीं गई। हमें यह भी नहीं बताया कि शवों को कहां लेकर जा रहे हैं। हमने पुलिस से बार-बार पूछा… गाड़ी में डालकर कहां ले जा रहे हो? लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। हम कम पढ़े-लिखे लोग हैं, लेकिन इतना तो जानते हैं कि बिना परिजनों की मौजूदगी के न तो शव को पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया जा सकता है और न ही पोस्टमॉर्टम किया जाना चाहिए।” “हमने यही बात पुलिस से भी कही, लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टा हमें धक्का देकर हटा दिया गया। फिर गाड़ियों में शव डालकर वो सब निकल गए। हमें नहीं मालूम था कि वो शवों के साथ क्या करने वाले हैं। डर था कि कहीं सबूत मिटाने की कोशिश तो नहीं हो रही?” बिना मर्जी लेकर गए, हमें देखने तक नहीं दिया
वो हमारी मर्जी के बगैर तीनों शव लेकर गए। जब सब कुछ परिजनों को बिना बताए ही कर लेना था तो आगे की प्रक्रिया करने के लिए भी पुलिस पूरी तरह से स्वतंत्र थी। हम यह मान लेंते कि हमारे घर के सदस्य पुलिस की भेंट चढ़ गए। अंतिम समय तक में देखने नहीं दिया। उनके शरीर में मौजूद चोट के निशानों को भी छिपाया गया। पिता ने कहा था- पुलिस ने बहुत मारा, यहां मत आना
बेटी मंजू साकेत ने कहा- “आखिरी बार पापा से मेरी बात 17 मार्च को हुई थी, उन्होंने कहा था- शरीर का एक-एक अंग दुख रहा है। पुलिस ने बहुत बेरहमी से मारा है। तुम लोग भूलकर भी यहां मत आना, लगातार गिरफ्तारी हो रही है। उसके बाद पापा को कई बार कॉल किया, घंटों इंतजार किया, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया।” इस दौरान गांव में तनाव गहराता गया। घटना के बाद पुलिस की मौजूदगी और लगातार हो रही गिरफ्तारियों से दहशत थी। कई ग्रामीण डरकर गांव छोड़ गए। मंजू ने कहा कि हमने यही मान लिया कि शायद पिता, भाई और बहन भी गांव के अन्य लोगों के साथ पलायन कर गए होंगे। हमने सोचा, उन्होंने फोन इसलिए बंद कर दिया होगा, क्योंकि पुलिस का डर था। गांव में हर कोई यही कर रहा था, लेकिन जो हुआ वह हमने सपने में भी नहीं सोचा था। “हत्या की आशंका, सीबीआई जांच हो”
मृतक के बड़े भाई रामधारी साकेत ने साफ शब्दों में कहा, जिस तरह तीनों शव मिले हैं, और जिस प्रकार पुलिस ने पहले बेरहमी से मारपीट की थी, उससे यह पूरी घटना स्वाभाविक नहीं लगती। इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए। हम चाहते हैं कि इसकी जांच सीबीआई करे, तभी सच सामने आएगा। उन्होंने बताया कि गांव में दो परिवारों के बीच चले आ रहे विवाद में पूरा गांव पीस दिया गया। दो घरों की लड़ाई की सजा पूरे गांव को मिली। पुलिस ने पूरे गांव को अपराधी समझ लिया। दहशत ने छीनी नींद, भूख-प्यास में टूटा परिवार
लक्ष्मी साकेत की आंखों में सूखे आंसुओं की लकीरें थीं। थकावट, दुख और डर, तीनों चेहरे पर साफ झलक रहे थे। उन्होंने रुंधे हुए स्वर में कहा, “सुबह से अब तक कुछ भी नहीं खाया… और अब रात हो चली है, लेकिन भूख से ज़्यादा नींद को लेकर बेचैनी है, जिस घर में एक साथ तीन जनों की लाशें उठीं हों, वहां नींद भला कैसे आ सकती है?” पुलिस ने हमारे घर पर ताला डाल दिया, लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा कि अब हम रात कहां बिताएंगे? क्या हमारे पास खाने को कुछ बचा भी है या नहीं? छोटे-छोटे बच्चे भी भूखे हैं… प्यासे हैं… लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। एसडीओपी को हटाया, मजिस्ट्रियल जांच होगी परिजन और ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर हत्या का आरोप लगाया। मामले की सीबीआई जांच और एसडीओपी को हटाने की मांग को लेकर अड़ गए। उन्होंने अंतिम संस्कार करने से भी मना कर दिया। कलेक्टर और एसपी के काफी देर समझाने के बाद वे अंतिम संस्कार के लिए माने। परिजन की मांग पर एसडीओपी अंकिता सूल्या को हटाकर आईजी ऑफिस अटैच किया गया। वहीं, कलेक्टर ने कहा कि मामले की मजिस्ट्रियल जांच होगी। आईजी बोले- यह मामला पहले वाली घटना से अलग
रीवा ज़ोन के आईजी गौरव राजपूत का कहना है कि औसेरी साकेत के घर से तेज दुर्गंध की सूचना मिली थी। जब पुलिस मौके पर पहुंची और खिड़की से झांककर देखा गया, तो पाया कि घर का दरवाज़ा अंदर से बंद है। अंदर औसेरी साकेत, उनकी 11 साल की बेटी मीनाक्षी और 8 साल का बेटा मृत मिला। प्रारंभिक जांच के आधार पर यह मामला पारिवारिक कारणों के चलते सामूहिक आत्महत्या का लग रहा है। 15 मार्च को गड़रा गांव में हुई हिंसात्मक घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। यह एक अलग मामला है। दुर्गंध आने पर शुक्रवार सुबह पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुंची। पूरे घर को सील कर शवों को कब्जे में लिया और फॉरेंसिक जांच की प्रक्रिया शुरू की गई। ग्रामीण बोले- दो घरों की लड़ाई में हमें झूठा फंसाया
गांव के कई परिवारों का कहना है कि पुलिस ने निर्दोष लोगों को जबरन उठाकर जेल भेज दिया, उन पर अत्याचार किए, और उनकी आवाज़ सुनी तक नहीं गई। निर्मला साकेत कहती हैं कि “मेरे पति राम सजीवन साकेत, बेटा रोहत और दो भतीजे सुरेश व कृष्ण कुमार को जेल में डाल दिया गया। जबकि चारों निर्दोष हैं। जिस दिन गांव में हिंसा हुई, हम सभी खेत में फसल काट रहे थे। लेकिन 17 मार्च को पुलिस आई और मारते-पीटते हुए सबको गाड़ी में ठूंसकर ले गई। इसी तरह शशिकला साकेत का कहना है कि “मेरे पति राम कैलाश साकेत को भी पुलिस हिंसा में शामिल बताकर उठा ले गई, जबकि वह उस दिन घर पर ही थे। हमारे घर का माहौल ऐसा था कि कोई बाहर तक नहीं निकला। मेरा बड़ा बेटा सोनू साकेत जन्म से ही दिव्यांग है, दोनों पैर और हाथ से। पर पुलिस ने न हमारी बात सुनी, न ही हमारे हालात देखे।” फंदे पर मिले थे पिता-दो बच्चों के शव बता दें कि गडरा गांव में शुक्रवार को औसेरी साकेत (55), उसकी बेटी मीनाक्षी (11) और बेटे अमन (8) के शव घर में फंदे पर मिले थे। शव पूरी तरह सड़ और गल चुके थे। परिजन ने आरोप लगाए हैं कि पुलिस ने पिटाई के बाद शव फंदे से लटका दिए। इसी गांव में 15 मार्च को एक युवक सनी द्विवेदी की आदिवासियों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इसके बाद हुई हिंसा में एएसआई रामचरण गौतम की मौत हो गई थी। 15 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे। तब से गांव में धारा 144 लागू है और पुलिस बल तैनात हैं।


