मीठा चना, मोटा भुजिया, पताशा, रोटा, फोगले का रायता, नारियल की चिटकी और पान का भोग। धींगा गवर को भोग लगाने का यह जतन बुधवार को उन घरों में हुआ जहां धींगा गवर की पूजा की जाती है। जिनकी कामना पूर्ति हुई उन महिलाओं ने धींगा गवर का आभार धन्यवाद जाताते हुए उजाणा किया। उजाणा में धींगा गवर पूजने वाली 16 महिलाओं को रोटा चूरमा,आलू की सब्जी,फोगले का रायता का भोजन करवाकर उन्हें साड़ी ब्लाउज पीस दिए गए। एक महिलाओं को सुहाग के 16 शृंगार युक्त छाबड़ी भी दी गई। अल सुबह घरों में धींगा गवर की पूजा करने की तैयारियां शुरू हो गई। दोपहर होते-होते घरों से गीतों की आवाज गली मोहल्लों में सुनाई देने लगी। …बारह बरस रा ईशरजी रे लाल लोगों, ईशरजी रे लाल तेरह बरसों री गवरल गोरी। झड़ाझड़ी रंग मौल मे रे लाल लोगों मौल मेरे लाल, छोड़ गवरल ईशर रो दुपट्टो, अरे छोड़ गवरल रो दुपट्टो …। गीतों के माध्यम से महिलाओं ने गवर माता को खुश कर मन्नते मांगी। बुधवार को जब गवर की विदा का समय आया तो धूमधाम से इसे मनाया गया। महिलाएं गवर को सिर पर रखकर नजदीकी कुएं पर गईं। वहां पानी पिलाने और खोल भरने की रस्म निभाई गई। पानी पिलाने की रस्म निभाने के साथ गीत-संगीत पर नृत्य करती हुई महिलाओं ने गवर को विदा किया। इसके साथ ही 16 दिवसीय गवर माता के उत्सव की पूर्णाहुति हुई। कई मोहल्लों में धींगा गवर माता के सामूहिक गीतों का आयोजन भी हुआ। बारह गुवाड़ चौक धींगा गवर का दो दिवसीय मेला भी शुरू हुआ। बड़ी संख्या में महिलाएं मन्नत मांगने बारह गुवाड़ चौक पहुंची। धोबी धोरा पर धींगा गवर की पूजन धूमधाम किया गया। पूजन में आस-पास की महिलाओं ने धींगा गवर के गीत गाए और नृत्य किया गया। पूजन में तारा देवी, सविता जोशी, ज्योति आचार्य, शशि आचार्य, उमा आचार्य, भगवती देवी, बेबी, मंजू तंवर, लक्ष्मी आचार्य, मधु और श्यामा आदि मौजूद रही। 44 वर्षों से धींगा गवर का पूजन कर रही समाज सेवी शोभादेवी व्यास से जब धींगा गवर को दीपवार पर उकेरनी कहानी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसर मोम से बनी घींगा गवर को कपड़े में लिपटाकर भगवान शिव मां पार्वती को देते हुए कहा, इसे घर में कहीं रख दो। मां पार्वती उसे रसोई में चूल्हे के निकट खूंटी पर टांग देती हैं। नीचे चूल्हा जलने के कारण मोम पिघलने लगता है और पैरों का मोम पिघल जाता है। उसे देख पार्वती माता उसको बाहर फेंक आती है। जब शिवजी उसके बारे में पूछते है तो मां पार्वती कहती है कि उसे तो अंकुड़ी पर फेंक दिया। जब वापस लाने जाती हैं उसे घींगा गवर कहती है कि मैं क्यों चलू। मुझे ऐसे में कौन पूजेगा। मेरे तो पैर भी नहीं है। ऐसे में मां पार्वती और शिवजी कहते हैं कि आप ऊंचे स्थान पर रहोगी। उसके बाद से घींगा गवर को दीवार पर बनाया जाने लगा। घींगा गणगौर कमल के फूल पर विराजमान होती हैं। इन गणगौर माता का पूजन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शोभादेवी बताती है कि अखंड सुहाग की कामना के लिए धींगा गवर की पूजा की जाती है।


