प्रदेश में 3.30 लाख पशुओं के टीकाकरण कार्यक्रम पर संकट:पशुपालन विभाग का आदेश- डॉक्टर, कर्मचारी अस्पताल से बाहर नहीं जाएं

आने वाले दिनों में पशुओं के टीकाकरण को लेकर संकट खड़ा हो सकता है। यही नहीं, पशु चिकित्सा अधिकारी व तकनीकी कर्मचारियों को फील्ड में जाकर पशुओं की जांच में भी बाधा आ सकती है। पशुपालन विभाग के एक आदेश के आदेश ने यह गफलत पैदा कर दी है। इस आदेश में सरकार यह भी मान रही है कि उनके अधिकारी-कर्मचारी सरकारी दवाओं को अपनी निजी प्रेक्टिस में काम ले रहे हैं। असल में पशुपालन निदेशालय ने पिछले माह एक आदेश निकाला है। इस आदेश में कहा गया है कि कार्यालय समय में संस्था (पशु चिकित्सालय) से बाहर पशुओं के इलाज के लिए कोई भी पशु चिकित्सक या कर्मचारी भ्रमण नहीं करेगा। हालांकि आदेश में यह भी लिखा है कि अत्यावश्यक केसेज को छोड़कर। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि वे अत्यावश्यक केसेज क्या होंगे। अब चिकित्सक व कर्मचारी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि जिस विभाग में पशुओं की जांच व हर तरह के टीकाकरण घर-घर जाकर (डोर स्टेप) ही होता है, वहां कैसे कामकाज हो पाएगा। दवा के लीकेज पर भी विवाद आदेश में कहा गया है कि पशुधन निशुल्क आरोग्य योजना के तहत निशुल्क उपलब्ध दवाओं को प्राइवेट प्रेक्टिस में उपयोग नहीं की जाए। प्राइवेट प्रेक्टिस पर मामूली फीस राज्य सरकार ने 2013 में एक नोटिफिकेशन के जरिए पशु चिकित्सकों की निजी प्रेक्टिस के लिए फीस 75 रुपए और तकनीकी कर्मचारियों (एलएसए) आदि के लिए 30 रुपए निर्धारित की थी। जबकि 30 रुपए के लिए कोई भी पशुधन सहायक पशुपालक के घर नहीं जाना चाहता। अस्पतालों का समय सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक का है। राज्य में पशुओं को घलघोंटू, काला ज्वर, ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियों के लिए पशुओं को टीके लगाए जाते हैं। पिछले वर्ष अलग-अलग टीकाकरण कार्यक्रम में करीब 3.30 करोड़ पशुओं को टीके लगाए गए। यह कार्यक्रम पूरी तरह डोर स्टेप होता है। आमतौर पर एक साल में औसतन साढ़े तीन करोड़ पशुओं का टीकाकरण होता है। विभाग के कर्मी यदि फील्ड में नहीं जाएंगे तो टीके कैसे लगेंगे, इस पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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