आंगनबाड़ी केंद्रों में बंट रहे पोषाहार की जांच में खुलासा:पोषाहार में सिर्फ 26% ही कैिल्शयम, 5 से 10%विटामिन; बच्चे खाते नहीं, पशुओं को खिला रहे

कुपोषण दूर करने के लिए राज्य सरकार हर साल करीब 1000 करोड़ रुपए आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पोषाहार बांटने पर खर्च कर रही है। हाल ही में पोषाहार की गुणवत्ता की जांच भी कराई और इसे बढ़िया क्वालिटी का बताया। भास्कर ने रियलिटी चेक किया तो स्थिति बिल्कुल ही उलट मिली। आदिवासी इलाकों की आंगनबाड़ियों में बच्चे इस पोषाहार को खाना पसंद नहीं कर रहे। कई जगह दलिया मवेशियों को खिलाया जा रहा है। भास्कर ने सरकार से मान्यता प्राप्त जयपुर की जगदम्बा लेबोरेट्री से पोषाहार की जांच कराई तो बड़ा खुलासा सामने आया। विभाग के दावे के विपरीत सिर्फ 5 से 10% तक ही विटामिन मिले। खिचड़ी में 6 प्रकार के विटािमन मिलाकर 345.6 मिलीग्राम होना चाहिए जबकि जांच में सिर्फ 34.93% मिला। कैल्शियम भी विभाग के दावे का सिर्फ 26% था। इसी तरह मीठा दलिया और बालहार में पोषक तत्व पूरे नहीं थे। आंगनबाड़ी कर्मी बोले- पोषाहार के कट्टों में सीलन, निदेशक का दावा…तीन स्तर पर जांच कराई जाती है उदयपुर के भील बस्ती आंगनबाड़ी पर पोषाहार के पैकेट खराब हो गए। खिचड़ी में दाल ही नहीं थी। कार्यकर्ताओं ने बताया कि इसे पशुओं को खिला देते हैं। बड़ी आंगनबाड़ी केंद्र पर शंकर सेन बोले बच्चे खाना पसंद नहीं करते। देबारी में चंदना ने बताया कि एक ही पैकेट सरकार दे, लेकिन वह ढंग का देना चाहिए। डूंगरपुर- प्रतापगढ़ में आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चे आना भी पसंद नहीं कर रहे हैं। बांसवाड़ा के गांगड़तलाई में पोषाहार के कट्टे खुले में पड़े थे और पोषाहार जानवरों को खिलाया जा रहा था। प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या 6% से बढ़कर 37% पहुंची एक साल के आंकड़े देखे तो राजस्थान में 6% कुपोषित बच्चे बढ़ गए हैं। अप्रैल-2023 में 35.70 लाख बच्चोें में 31% यानी 12 लाख बच्चे बौने और 17% बच्चों का वजन कम मिला। नवंबर 2024 में यहां बौने बच्चों का आंकड़ा 37% तक चला गया है, वहीं कम वजनी का आंकड़ा भी 17 से 19% हो गया है। चौंकाने वाली बात यह है की आदिवासी इलाकों में कुपोषित बच्चे सबसे ज्यादा हैं, जहां उदयपुर जिला बौने बच्चों में 52% और कम वजनी में 33% के साथ सबसे टॉप पर है। इसके अलावा एनआरसी (राष्ट्रीय पुनर्वास केंद्र) अस्पताल में अति कुपोषित बच्चों की संख्या भी साल दर बढ़ रही है। जहां साल 2020-21 में 3448 बच्चे भर्ती हुए तो वहीं साल 2023 में यह आंकड़ा 6834 तक पहुंच गया। यानी एक साल में दोगुने बच्चे भर्ती हुए हैं।

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