सरायकेला- खरसावां गढ़जात को ओडिशा के मयूरभंज जिले में लौटाने के लिए 18 मई 1949 को किया गया था इकरारनामा

गोलक | सरायकेला आज ही के दिन 18 मई 1948 को सरायकेला-खरसावां गढ़जात को सिर्फ एक साल के लिए बिहार में शामिल कराया गया था। एक साल के बाद 18 मई 1949 को सरायकेला- खरसावां गढ़जात को ओडिशा के मयूरभंज जिले में लौटाने के लिए इकरारनामा हुआ था। 76 वर्ष के बाद भी आज तक सरायकेला-खरसावां को ओडिशा में लौटाया नहीं गया। कारण चाहे जो भी हो, यहां के लोग, यहां की भाषा, यहां की परंपरा और संस्कृति आज भी ओडिशा की ही जुबानी बोलती है। आजादी के समय पूरे भारत में 562 गढ़जात हुआ करते थे, इसमें सरायकेला-खरसावां भी एक गढ़जात हुआ करता था, आजादी के बाद 14 दिसंबर 1947 व 15 दिसंबर 1947 को कटक के टाउन हॉल में केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में एक विशेष बैठक रखी गई थी, जिसमें मयूरभंज को छोड़कर ओडिशा के 25 गढ़जातों को ओडिशा में शामिल कराया गया। इसी बैठक में सरायकेला-खरसावां गढ़जात को भी ओडिशा में शामिल करते हुए एक स्वतंत्र जिला बनाया गया। एक जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड के बाद सरायकेला-खरसावां को एक साल के लिए अस्थाई तौर पर बिहार में शामिल कराया गया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के बाद ओडिशा का स्वतंत्र जिला सरायकेला- खरसावां बिहार में रखा गया, क्योंकि उस समय खरसावां गोलीकांड के बाद विभिन्न परेशानी व विसंगति को लेकर इसे बिहार में लाया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा साफ तौर पर कहा गया कि जब मयूरभंज को ओडिशा में शामिल कराया जाएगा उस समय सरायकेला- खरसावां जिला को भी बिहार से अलग करते हुए ओडिशा को लौटा दिया जाएगा। बाद में मयूरभंज को ओडिशा में शामिल कर दिया गया, परंतु उससे सटा सरायकेला-खरसावां जिला अब भी बिहार यानी वर्तमान में झारखंड में है। ओडिशा से अलग हुए 76 साल हो गए, परंतु यहां की संस्कृति व परंपरा ओडिशा से पूर्ण रूप से मेल खाती है। लोग कहीं न कहीं तथा किसी न किसी रूप से ओडिशा से जुड़े हुए हैं। शिक्षा-रोजगार पर लगा ग्रहण : ऐसे तो पूरे सिंहभूम में उड़िया स्कूलों की संख्या 350 थी, परंतु हमारे सरायकेला-खरसावां जिले में उड़िया स्कूलों की संख्या 100 से अधिक है, जो वर्तमान में बंद कर दिए गए हैं, यानी शिक्षा पर वर्तमान सरकार का नकारात्मक रवैया रहा है। वहीं, रोजगार के क्षेत्र में भी उड़िया भाषियों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही है, उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा है। भाषा के संरक्षण के लिए भी वर्तमान सरकार ध्यान नहीं दे रही है। उड़िया शिक्षकों की बहाली नहीं हो रही है, जिसके कारण भाषा भी दम तोड़ रही है। उड़िया बच्चे चाह कर भी उड़िया नहीं पढ़ पा रहे हैं। समाजसेवी कार्तिक परीक्षा भाषा संस्कृति संरक्षण पर चलाएंगे अभियान : समाजसेवी कार्तिक परीक्षा ने कहा कि सरायकेला-खरसावां जिले में उड़िया भाषियों की स्थिति दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। भाषा संरक्षण के लिए सरकार की ओर से किसी प्रकार का ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। जिले में संचालित 100 से अधिक उड़िया स्कूलों को बंद कर दिया गया है, जिससे बच्चों को उड़िया शिक्षा नहीं मिल पा रही है। उड़िया स्कूलों में जबरन दूसरी भाषा के शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति किया जा रहा है। लोग रोजगार के लिए तरस रहे हैं। इनके संरक्षण के लिए एक विशेष अभियान प्रारंभ किया जा रहा है। उड़िया भाषियों के लिए राज्य सरकार से विशेष पैकेज की मांग : आध्यात्मिक उत्थान जगन्नाथ मंडली के संस्थापक सह झारखंड रत्न ज्योतिलाल साहू ने कहा कि यहां की संस्कृति व परंपरा ओडिशा से अलग नहीं है। राज्य सरकार की अनदेखी किए जाने से यहां उड़िया भाषा और भाषियों का अस्तित्व आज खतरे में पड़ गई है। राज्य सरकार को इन्हें संरक्षित कर रखने की आवश्यकता है। साथ ही उड़िया भाषियों के लिए राज्य सरकार की ओर से विशेष पैकेज दिया जाना चाहिए।

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