भिक्षुक मुक्त इंदौर के लिए प्रशासन, नगर निगम और संस्था मिलकर प्रयास कर रहे। इसी का परिणाम है कि 4 साल में 2500 से ज्यादा भिक्षुकों को नौकरी व घरेलू कामकाज से जोड़कर जीवन की मुख्य धारा में ला चुके हैं। इनमें 220 से अधिक लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त थे, जिनका इलाज भी किया गया। वहीं 550 से अधिक ऐसे बच्चों को भी भिक्षावृत्ति से दूर किया है, जिनके माता-पिता या सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें भिक्षुक बना दिया था। 1. पति ने भिक्षावृत्ति में धकेला, महिला अब सम्मान से जी रही एक महिला को पति ने ही भिक्षावृत्ति में धकेल दिया था। महिला का जब रेस्क्यू किया, वह मानसिक रूप से बहुत डरी हुई थी। संस्था ने उसका उपचार करवाया। महिला अब एक कैंटीन में नौकरी कर रही है। 2. नशे की गिरफ्त में 15 साल रहे, अब सिलाई फैक्टरी में हैं एक युवा 18 साल की उम्र से नशे की गिरफ्त में चला गया। घर के गहने तक बेच दिए। फिर भीख मांगने लगा। 33 वर्ष की आयु में उसे नगर निगम और संस्था प्रवेश ने रेस्क्यू किया। सालभर उपचार कराया। अब वह सिलाई फैक्टरी में 15 हजार महीना पर नौकरी करता है। 3. अब पिताजी की प्रेस की दुकान संभाल रहे हैं बचपन में दोस्तों ने पहले नशे की लत लगवाई, फिर पैसों के लिए भीख मंगवाई। संस्था ने रेस्क्यू किया, फिर नशे की लत छुड़वाने के लिए सालभर तक उपचार करवाया। युवक अब पिता की प्रेस की दुकान संभालता है। रोज 700 से 900 रुपए कमाता है। 70 लोगों की टीम डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ के साथ डाइटिशियन भी शामिल हैं संस्था प्रवेश की रुपाली जैन ने बताया भिक्षुक मुक्त अभियान के लिए 70 लोगों की टीम बनाई है। इसमें डॉक्टर, नर्स, डाइटिशियन, साइकोलॉजिस्ट, साइकैटरिस्ट, समाजसेवी शामिल हैं। 450 से ज्यादा वॉलेंटियर भी जुड़े हैं। सरकार व प्रशासन के साथ मिलकर परदेशीपुरा में पुनर्वास केंद्र चलाते हैं, जिसमें वर्तमान में 39 लोग रह रहे हैं। इससे पहले 2500 से अधिक लोग यहां आकर परामर्श लेकर वापस परिवार के पास लौट गए हैं।


