शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण इन दिनों चर्चा में है। सभी जिलों को सत्र शुरू होने से पहले अतिशेष यानी जरूरत से अधिक पदस्थापना वाले शिक्षकों को वहां भेजा जा रहा है, जहां शिक्षक हैं ही नहीं या फिर कम हैं। प्रदेश में अभी 11 हजार शिक्षक ऐसे हैं, जिनकी स्कूलों में जरूरत ही नहीं। स्कूल शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी मानते हैं कि सरकारी सेवा में पोस्टिंग जरूरत के हिसाब से होगी। किसी स्कूल में शिक्षक कम हैं तो कहीं अतिरिक्त हैं। यही वजह है कि युक्तियुक्तकरण किया जा रहा है। भास्कर से सचिव की खास बातचीत- भास्कर इंटरव्यू- प्रक्रिया 10 साल बाद इसलिए आंकड़े ज्यादा, 90% शिक्षक उसी जिले में रहेंगे छत्तीसगढ़ में इतने सालों बाद युक्तियुक्तकरण की जरूरत क्यों पड़ी?
परदेशी: राज्य सरकार ने एनईपी 2020 को पिछले साल एडॉप्ट करने का निर्णय लिया था, ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। आरटीई 2009 में आया, जो राज्य में 2010 से लागू है। हमने पाया कि यहां शिक्षक के मामले में बहुत असंतुलन था। शहरी क्षेत्र में शिक्षक सरप्लस थे और ग्रामीण इलाके में बड़ी संख्या में स्कूल शिक्षक विहीन और एकल शिक्षकीय थे। राज्य में 211 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी छात्र नहीं, फिर भी शिक्षक पदस्थ थे। जमीनी स्तर पर और क्या दिक्कतें हैं, जिनके कारण यह करना पड़ा?
कई परिसरों में प्राइमरी, मिडिल, हाई व हायर सेकेंडरी स्कूल अलग-अलग चल रहे हैं। पहले प्राइमरी के छात्र को उसी परिसर में मिडिल में पढ़ने के लिए टीसी लेना पड़ता था। इससे काफी बच्चे परेशान होते थे और ड्रॉपआउट बढ़ता था। ऐसे में स्कूल बंद नहीं हुए। इन्हें मर्ज किया गया। युक्तियुक्तरण से पहले क्या कोई सर्वे किया था?
इसकी तैयारी कई महीनों से की जा रही थी। प्रदेशभर में सर्वे कर फीडबैक लिया गया। छात्र-शिक्षक अनुपात निकाला, देखा कि इसका समाधान क्या होगा। मंथन के बाद पॉलिसी लाई गई। शिक्षा की गुणवत्ता और ड्रॉपआउट रोकने के लिए यह जरूरी था। क्या कोई और विकल्प नहीं था?
नहीं, लोगों की मांग थी कि शिक्षक उपलब्ध कराएं। शहर में ज्यादा और गांव में शिक्षक कम थे तो युक्तियुक्तकरण ही एकमात्र रास्ता था। युक्तियुक्तकरण अच्छी पॉलिसी है तो विरोध क्यों है?
कई शिक्षक जो शहरी क्षेत्र में सरप्लस थे, अब उन्हें अब ग्रामीण क्षेत्र के उन स्कूलों में पढ़ाना होगा, जहां एक भी शिक्षक नहीं या एकल शिक्षक हैं। 11 हजार शिक्षक अतिशेष, ये…
अगर सरकारी सेवा में आए हैं तो जहां जरूरत होगी, वहां काम करना होगा। यह भी बताना चाहूंगा कि 90 प्रतिशत शिक्षक उसी जिले में रहेंगे। अब सवाल विरोध करने का? दूसरी बात, कहीं कोई स्कूल बंद नहीं हो रहा है। कुछ लोग भ्रामक जानकारी दे रहे हैं तो इसे न मानें। विरोध कौन कर रहा यह अलग बात है। हमने काउंसिलिंग कराई। इसमें लगभग सारे शिक्षक शामिल हुए और पोस्टिंग ली। इसका मतलब है कि उन्हें सरकार पर भरोसा है। अतिशेष शिक्षक ही काउंसिलिंग में भाग ले रहे हैं। 10 हजार से अधिक स्कूलों को मर्ज कर रहे हैं, उनके सेटअप का क्या होगा?
शिक्षा का अधिकार प्रदेश में 2010 से लागू है। इसमें स्पष्ट है कि बच्चों की दर्ज संख्या के अनुसार शिक्षक रखें। आरटीई केंद्रीय कानून है। इसे मानना हर राज्य का दायित्व है। हम उसी कानून का पालन कर रहे हैं। अभी कोई भी पद समाप्त नहीं किया है। पहली से पांचवीं में पांच क्लास हैं। अगर वहां 20 बच्चे भी हैं तो पांच क्लास को दो शिक्षक कैसे पढ़ाएंगे?
आरटीई की जब पॉलिसी बनी तो उसके लिए भी मंथन हुआ। प्राथमिक स्कूल दो कमरे के होते हैं। इस अनुसार दो शिक्षक रखे जाते हैं। हमारे यहां यह मल्टीक्लास शिक्षा देने का कंसेप्ट है। मान लें 20 बच्चे हैं तो पहली कक्षा में 5, दूसरी में 3, तीसरी कक्षा में कुछ बच्चे हैं तो उनको मिलकर पढ़ाया जाता है। व्यावहारिक रूप में ऐसा ही होता है। अतिशेष शिक्षकों की संख्या कितनी है?
11000 से अधिक शिक्षकों की पदस्थापना की गई है। और भी जिलों की जानकारी सामने आएगी। रायपुर, बिलासपुर में बड़ी संख्या में अतिशेष शिक्षक हैं। देश के अन्य राज्यों में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण का फॉर्मूला और हमारा फॉर्मूला अलग है या समान है?
सभी राज्यों में लगभग एक जैसा फॉर्मूला है। मप्र, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में युक्तियुक्तरण की जो प्रक्रिया अपनाई गई यहां भी वही अपनाई जा रही है।


