शिबू से डीसी सक्सेना इतने प्रभावित हुए कि उनसे मिलने पलमा पहुंच गए

इंदिरा गांधी से मिले गुरुजी शिबू सोरेन जेल से बाहर आए। कुछ दिन बाद बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र उन्हें लेकर दिल्ली गए। कहा जाता है कि जगन्नाथ मिश्र ने इंदिरा गांधी के कहने पर ऐसा किया था। दिल्ली में इंदिरा गांधी शिबू सोरेन से मिलीं। इंदिरा गांधी के कहने पर शिबू सोरेन को एक ट्रैक्टर दिया गया। 1980 का चुनाव आया तो इंदिरा गांधी के कहने पर कांग्रेस ने शिबू की पार्टी को 19 सीटें दीं। हालांकि, शिबू और कांग्रेस का संबंध लंबा नहीं चला। जैनामोड़ में पहली बार हुई शिबू सोरेन व विनोद बाबू की मुलाकात
विनोद बिहारी महतो कचहरी में शिबू को देख चुके थे, लेकिन आमने-सामने मुलाकात नहीं हुई थी। विनोद बाबू शिबू से मिलने के लिए जैनामोड़ आए। वहां शिबू सोरेन व विनोद बाबू की पहली मुलाकात हुई। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के करीब आते गए। विनोद बाबू का घर शिबू का ठिकाना बना। 1971 में विनोद बाबू लोकसभा चुनाव लड़े। वे हार गए, पर शिबू ने उन्हें पूरी मदद की। पुलिस पकड़ से रहे बाहर… वेष बदलने में खूब माहिर थे गुरुजी गुरुजी का आंदोलन बढ़ता गया। पुलिस अलग खोजती और महाजन के गुंडे अलग। गुरुजी वेष बदलने में माहिर थे। एकबार की बात है, गुरुजी को पकड़ने के लिए पुलिस नेमरा गांव के घर पर छापेमारी की। गुरुजी ने प|ी की साड़ी पहन ली और गोबर फेंकने का खचिया सिर पर लेकर पुलिस के सामने से निकल गए। इसी तरह एकबार पारसनाथ के भेलवाडीह गांव को पुलिस ने घेर लिया। उन्हें गुरुजी की तलाश थी। गुरुजी मल्लाह बनकर पुलिस के सामने से निकल गए। शिबू का उग्र तेवर देखकर विनोद बिहारी महतो खूब प्रभावित हुए शिबू सोरेन का नाम फैलता गया। अब उनके प्रभाव क्षेत्र में सिर्फ गोला, पेटरवार, जैनामोड़, गोमिया और बोकारो ही नहीं, धनबाद भी था। इधर, शिबू पर केस बढ़ रहे थे। कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के लिए वे धनबाद आए थे। कोर्ट में एक अधिकारी ने शिबू को धमकाते हुए कहा- मारपीट बंद करो, नहीं तो बंद कर दूंगा। शिबू ने उसी तेवर में जवाब दिया, कहा- जब तक महाजन शोषण बंद नहीं करेंगे, हमारी कार्रवाई जारी रहेगी। आपको जो करना है, करते रहिए। उनकी यह बात वहां मौजूद वकील विनोद बिहारी महतो ने भी सुना। विनोद बाबू ने अपने साथी एसके सहाय से कहा- इस आदिवासी युवक में दम है। नजर रखो। आदमी हमारे काम का लगता है।
सक्सेना और शिबू की मुलाकात किचिंग्या ने अपना काम कर दिया था। शिबू और डीसी सक्सेना साहब की मिलने की बात तय हुई। सक्सेना साहब शिबू से मिलने के लिए अकेले पलमा पहुंच गए। सक्सेना साहब ने शिबू को अपना परिचय दिया- मैं धनबाद का नया डीसी हूं। वे शिबू के गले मिले। सक्सेना साहब ने शिबू को आदिवासियों का मसीहा कहकर संबोधित किया। उन्हें समझाया कि आपका तरीका गलत है। हिंसक है। ऐसे जंगलों में रहकर कब तक लड़ेंगे। समर्पण कर दीजिए। सरकार आपकी सहायता करेगी। फिर जब मिले तो सक्सेना के साथ धनबाद के एसपी भी थे। महाजनों को यह बात नहीं पची। सक्सेना साहब का तबादला करा दिया गया। लेकिन उन्होंने जाते-जाते शिबू सोरेन को मुख्य धारा में जोड़ने का रास्ता खोल दिया था। डीसी ने सीएम से बात कराई नए डीसी लक्ष्मण शुक्ल भी शिबू से मिलने पलमा गए। वे यह बताना चाहते थे कि सक्सेना साहब के जाने से कोई अंतर नहीं पड़ा है। वे भी उनके साथ हैं और मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। साल 1975। जाड़े का मौसम था। किचिंग्या टुंडी आश्रम में आए और शिबू सोरेन को बोले- डीसी साहब ने थाने में बुलाया है। शिबू को बताया गया कि थाने में ही सीएम जगन्नाथ मिश्र से उनकी बात कराई जाएगी। शिबू थाना जाने लगे। थाने में पहले से डीसी बैठे हुए थे। बड़ी संख्या में शिबू के समर्थक भी थाना पहुंचने लगे। डीसी ने सभी समझया कि उन्हें वे लेकर धनबाद जाएंगे। इन्हें जेल जाना होगा। इसके बाद ही सरकार उनकी मदद करेगी। लोग मुश्किल से माने। डीसी अपनी गाड़ी में बैठा कर शिबू को धनबाद स्थित अपने आवास लेकर आए। रात में खाना खिलाया। फिर मुख्यमंत्री से बात कराई। प्रक्रिया पूरी कर शिबू को जेल भेजा गया। कुछ दिन बाद उन्हें जेल से निकाल कर बोकारो लाया गया, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से कराई गई। टुंडी के जंगलों में शिबू सोरेन की समानांतर सरकार चल रही थी। क्षेत्र में आतंक का माहौल था। दारोगा की हत्या के बाद सरकार दबाव में थी। सरकार भी जानती थी कि शिबू को पकड़ना आसान नहीं है। उन्हें जनसमर्थन हासिल है। प्रशासन सीधे हाथ लगाने से हिचक रहा था। ऐसी स्थिति में सरकार ने शिबू की गतिविधियों पर काबू पाने के लिए केबी सक्सेना को धनबाद का डीसी बनाने का निर्णय लिया। सक्सेना ने 5 अगस्त 1974 को पदभार ग्रहण किया। शिबू पुलिस की पकड़ से दूर थे, इसलिए सक्सेना ने एके राय से शिबू के संबंध में पूछताछ की। सक्सेना चाहते थे कि वे पहले शिबू और उनकी गतिविधियों को समझे, ताकि वे अपनी रणनीति बना सके। सक्सेना अपने स्रोतों से जानकारी जुटा रहे थे। वे हैरान थे, क्योंकि जो उन्होंने शिबू के बारे में सुन रखा था, जानकारी उससे विपरीत आ रही थी। सक्सेना शिबू के कामों से इतने प्रभावित हुए कि स्वयं उनसे मिलने की इच्छा रखने लगे। इसके लिए संपर्क सूत्र का होना जरूरी था। सवाल था कि यह जिम्मेवारी किसे दी जाए, कौन सक्सेना व शिबू के बीच संपर्क सूत्र बनेगा। टुंडी के थानेदार बर्नाड किचिंग्या के रूप में डीसी को संपर्क सूत्र मिल गया। किचिंग्या आदिवासी थे और शिबू को पहले से जानते थे। किचिंग्या जान जोखिम में डालकर शिबू तक पहुंचे। शिबू सोरेन को समझाया कि उनके ऊपर 200 से अधिक केस हो चुके हैं। वे इस रास्ते को छोड़कर जननेता बनें और समाज का कल्याण करें। किचिंग्या के प्रस्ताव पर शिबू ने विचार करने के लिए समय मांगा। अगली मुलाकात में शिबू ने किचिंग्या ने पूछा- बेल देने का पावर है न। मेरे लोग एक-एक कर थाना जाएंगे, इन्हें बेल देते जाइएगा। किचिंग्या इसके लिए तैयार थे। शिबू को मुख्य धारा में लाने का यह पहला प्रयास सफल रहा। शिबू के रूप में विनोद बाबू को मिला सच्चा साथी, दोनों ने झारखंड आंदोलन को धार दी शिबू सोरेन ​शिबू ने थानेदार से पूछा… बेल देने का पावर है न, इस शर्त ने इतिहास में नया मोड़ दिया… विनोद बिहारी महतो के साथ शिबू सोरेन। हालांकि, विनोद बाबू और शिबू की मुलाकात उस दिन नहीं हुई। कुछ दिन बाद विनोद बाबू को पता चला कि शिबू आदिवासी सुधार समिति नामक संस्था चलाते हैं। विनोद बाबू भी शिवाजी समाज नामक एक संस्था चलाते थे। इस संस्था के माध्यम से वे बोकारो में रैयतों की लड़ाई लड़ते थे। स्टील प्लांट में जिन रैयतों की जमीन जाती, वे कुर्मी होते या आदिवासी। आदिवासियों को समझाने के लिए उन्हें किसी आदिवासी नेता की जरूरत थी। शिबू को देख उनकी यह जरूरत पूरी हो गई थी। 70 के दशक में शिबू सोरेन का प्रभाव गोला, पेटरवार, जैनामोड़, गोमिया, बोकारो के साथ-साथ धनबाद के टुंडी में भी हो गया था। टुंडी और पारसनाथ के पहाड़ी क्षेत्र में शिबू की समानांतर सरकार चलती थी।

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