गढ़वा| झामुमो नेता धीरज दुबे ने पुरानी यादें साझा करते हुए कहा कि 15 सितंबर 2016 को रांची स्थित मोहराबादी आवास पर दिशोम गुरु शिबू सोरेन से पहली मुलाकात हुई थी। उसी वर्ष हमने झारखंड मुक्ति मोर्चा का छात्र संगठन झारखंड छात्र मोर्चा ज्वाइन किया था। उस समय मेरी उम्र सिर्फ 19 वर्ष थी। जब गुरुजी से मुलाकात हुई तो हमने कांग्रेस की छात्र संगठन एनएसयूआई में रहते हुए 18 वर्ष की उम्र में जेल जाने का किस्सा गुरु जी को सुनाया। उस वक्त तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने 12 धाराओं में मुझे पूर्व सांसद स्व. ददई दुबे के साथ जेल में डाल दिया था। 18 वर्ष की अवस्था में मुझे सात दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। इस घटना को सुनकर दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने कहा था की संघर्ष के पथ पर चलना आसान नहीं है। इस पथ पर दूसरों के लिए करुणा, त्याग और ईमानदारी के साथ चलना पड़ता है। तमाम तरह की परेशानियां आएगी कभी तो ऐसा लगेगा कि जैसे कल का सूरज भी देखना मुनासिब न हो लेकिन जो निडर और अडिग रहकर इस पथ पर चलते रहता है। वहीं इतिहास बनाता है। उन्होंने झारखंड निर्माण आंदोलन के समय की का एक हिस्सा सुनाया तब उनके पीछे पुलिस और महाजन दोनों पड़े हुए थे, उस वक्त को याद करते हुए उन्होंने हमें बताया कि कई दिनों तक जंगल में भटकना पड़ता था, कई रातें बिना सोए गुजार देते थे और एक रात में तीन-चार ठिकानों को बदलना पड़ता था। कई बार ऐसा हुआ कि पानी पीकर भी रातें गुजारनी पड़ती थी। फिर भी हमने हार नहीं मानी तथा शोषण करने वाले लोगों के खिलाफ संघर्ष और झारखंड निर्माण के लिए आंदोलन जारी रखा। उन्होंने बताया था कि कई बार जान से मारने की धमकियां मिली, हमले किए गए और जब फिर भी मैं नहीं रुक तो मुझे षडयंत्रों में फंसाया गया, खरीदने की कोशिश की गई। परंतु तमाम परेशानियों के बीच मेरा एक ही लक्ष्य था नया राज्य झारखंड बनाना। साल 1980 में गिरिडीह के बिरनी ब्लॉक में एक सभा के दौरान वे मंच से बिना किसी हिचक के अधिकारियों को ललकारते नजर आए। उनकी ललकार से अधिकारियों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि आम लोगों की परेशानियां दूर नहीं करने पर सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन सभा के बाद, उन्हीं अधिकारियों से मुस्कुराते हुए कहा— “मंच से जो कहा, वह जनता की आवाज थी। अब मैं तुम्हारा अभिभावक हूं, मेरी बात का बुरा मत मानो, बल्कि बेहतर काम कर लोगों को संतुष्ट करो। राज्य गठन के बाद भी वे समय-समय पर गढ़वा आते रहे और पार्टी के प्रचार-प्रसार के कार्यक्रमों में जनता से सीधे संवाद करते रहे। शिबू सोरेन का जाना केवल एक नेता का खोना नहीं है, बल्कि झारखंड की उस राजनीतिक विचारधारा का अंत है जिसने जनता की आवाज़ को ताकत दी।


