छत्तीसगढ़ की विरासत मटपरई कला को मिली नई पहचान:दुर्ग के युवा शिल्पकार अभिषेक ने मिट्टी-कागज से बनाईं परंपरा की झलक

छत्तीसगढ़ की धरोहर मटपरई शिल्पकला को दुर्ग जिले के उतई नगर के शिल्पकार अभिषेक सपन ने नई पहचान दी है। मिट्टी और कागज की लुगदी से बनने वाली यह कला लगभग विलुप्त हो चुकी थी। अभिषेक ने तीजा तिहार के अवसर पर इस कला को नया रूप दिया है। तीजा तिहार छत्तीसगढ़ की महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। यह भादो माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन भाई अपनी बहन को मायके बुलाते हैं। बहन पहले दिन करेला खाकर उपवास करती है। दूसरे दिन बालू-मिट्टी से बने शिव की पूजा करती है। तीसरे दिन पकवान खाकर व्रत खोला जाता है। भाई बहन को साड़ी और श्रृंगार सामग्री भेंट करते हैं। तीजा की परंपराओं को किया जीवंत अभिषेक ने मटपरई कला में तीजा की परंपराओं को जीवंत किया है। उनकी कलाकृतियों में भाई को भांजी को कंधे पर बिठाकर ले जाते हुए दिखाया गया है। बेटियों को शिवजी की पूजा करते हुए दर्शाया है। भाई को बहन को उपहार देते हुए भी चित्रित किया है। मटपरई कला में ‘मट’ का अर्थ मिट्टी और ‘परई’ का अर्थ कागज की लुगदी है। पहले इस कला से टोकरी, खिलौने, गोरसी, गुल्लक और सजावटी सामान बनाए जाते थे। छत्तीसगढ़ी शब्दकोश में भी इस कला का उल्लेख मिलता है। अभिषेक के प्रयासों से यह विलुप्त होती कला फिर से जीवंत हो रही है। इंजीनियर से शिल्पकार बने अभिषेक इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले अभिषेक ने आधुनिक करियर छोड़ अपनी परंपरा का दामन थामा। उनका कहना है कि संस्कृति ही हमारी पहचान है। यदि इसे हम नहीं बचाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगी। आज उनकी बनाई कलाकृतियां न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश और विदेश तक पहुंच चुकी हैं। परिवार से मिली प्रेरणा अभिषेक बताते हैं कि उनकी परदादी भगैया बाई मटपरई कला में निपुण थीं। वे बच्चों के लिए सुंदर-सुंदर खिलौने बनातीं और लोककथाएं सुनाती थीं। परिवार के सदस्य रायपुर के महादेव घाट पुन्नी मेले में भी अपने शिल्प बेचा करते थे। यह प्रेरणा ही उन्हें परंपरा से जोड़े रखने में मददगार बनी। भविष्य की योजना और नई पहचान अभिषेक न केवल इस कला को पुनर्जीवित कर रहे हैं, बल्कि युवाओं को भी इससे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वे कार्यशालाएं आयोजित कर नई पीढ़ी को मटपरई शिल्प सिखाते हैं और इसे रोजगार से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उनका मानना है कि यदि यह कला जनमानस तक पहुंचेगी तो हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है और छत्तीसगढ़ की संस्कृति को वैश्विक पहचान मिलेगी।

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