सियाराम शरण वर्मा | गढ़वा जिले में जीवित्पुत्रिका व्रत अपनी अनूठी परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां आदिवासी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय के बीच यह पर्व बेहद हर्षोल्लास और आस्था के साथ मनाया जाता है। पुत्र की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर माताएं यह व्रत रखती हैं। ग्रामीण इलाकों में यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि सामाजिक मेल-जोल और सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक बन जाता है। नहाय-खाय से शुरू होती परंपरा : सामान्य परंपरा के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत नहाय-खाय से आरंभ होता है। इस दिन सभी समुदाय के लोग स्नान कर पवित्र भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन में चावल, दाल, कढ़ी, पांच प्रकार की सब्जी और साग का विशेष महत्व होता है। झिंगी व कंदा की सब्जी इसमें कंपल्सरी होता है। यही भोजन अगले दिन के निर्जला उपवास की तैयारी माना जाता है। सुबह होते ही व्रती महिलाएं समूह बनाकर नदियों में स्नान करने निकलती हैं। स्नान के पश्चात घर लौटकर शुद्ध वातावरण में पर्व के पारण की तैयारी की जाती है। खास बात यह है कि गढ़वा जिले में जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण मछली और भात से होता है। ग्रामीणों का मानना है कि मछली खाने से संतान दीर्घायु होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। यही कारण है कि पर्व के दिन घर-घर में मछली भात और अन्य व्यंजन बनाए जाते हैं। नहाय-खाय के अगले दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं। इस दौरान पूरे दिन घरों में शांति रहती है, लेकिन शाम ढलते ही माहौल पूरी तरह बदल जाता है। गांव-गांव में मधुर लोकगीत गूंजने लगते हैं। जैसे-जैसे रात गहराती है, मांदर की थाप तेज होती जाती है और पुरुष-महिलाएं लोकगीतों की ताल पर झूम उठते हैं। पारंपरिक धुनों और गीतों से वातावरण पूरी रात गुंजायमान बना रहता है। ग्रामीण इलाकों में यह नजारा आम है, जहां लोग नाचते-गाते सुबह का इंतजार करते हैं। मध्य रात्रि में काठ की छोटी चौकी पर मिट्टी से चिल्हो- सियारो बनाया जाता है। इसका पारंपरिक तरीके से पूजन किया जाता है। सदियों पुरानी परंपरा : स्थानीय लोग बताते हैं कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही श्रद्धा से निभाई जाती है। व्रत के दौरान जहां महिलाएं संतानों के मंगल की कामना करती हैं, वहीं लोकगीत और सामूहिक नृत्य सामाजिक एकजुटता का संदेश देते हैं। यह पर्व धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक उत्सव का अनोखा संगम है, जो गढ़वा जिले की पहचान को और भी विशेष बना देता है। इस तरह गढ़वा में जीवित्पुत्रिका व्रत केवल धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि सामुदायिक सौहार्द और परंपराओं की जीवंत मिसाल है।


