उदयपुर संभाग में मातृ और नवजात स्वास्थ्य की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। महाराणा भूपाल हॉस्पिटल में इस वर्ष जनवरी से जुलाई के बीच 9,544 प्रसव हुए। इनमें से 504 शिशु मृत जन्मे (52.8 प्रति हजार जन्म), जबकि 284 नवजात शिशुओं की जन्म के बाद मृत्यु हुई (31.4 प्रति हजार जीवित जन्म)। इसी अवधि में 65 प्रसूताओं की मौत दर्ज की गई, जिससे मातृ मृत्यु अनुपात 719 प्रति लाख तक पहुंच गया। ये आंकड़े राजस्थान और राष्ट्रीय औसत की तुलना में कहीं अधिक गंभीर हैं। प्रदेश में मातृ मृत्यु अनुपात 164 प्रति लाख और नवजात मृत्यु दर 14 प्रति हजार, जबकि देश में मातृ मृत्यु अनुपात 93 प्रति लाख और नवजात मृत्यु दर 19 प्रति हजार है। पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। वहीं, वर्ष 2022 में प्रसव के 28 दिन के भीतर 975 शिशुओं की मौत हुई थी, जबकि 2023 में यह संख्या घटकर 700 रही। विशेषज्ञों का मानना है कि उदयपुर संभाग की स्थिति राजस्थान और भारत दोनों से कहीं अधिक गंभीर है। सबसे बड़ी समस्या मृत जन्म दर और मातृ मृत्यु दर में दिख रही है। नवजात मृत्यु दर भी औसत से अधिक है। इसके पीछे मूल वजह ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच का न होना बताया है। राष्ट्रीय योजनाएं और स्थानीय चुनौतियां
केंद्र सरकार ने मातृ और शिशु मृत्यु रोकने के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएसएमए), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके), जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जारी है। बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर कई तरह की चुनौतियां हमारे बीच हैं। सुधार के लिए इन पर फोकस जरूरी “एमबी हॉस्पिटल में संभागभर से गर्भवती यहां रैफर होकर पहुंचती है, तो कुछ सीधे ही शुरू से यहां के चिकित्सकों से उपचार ले रही होती है। प्रयास ये रहता है कि किसी तरह की परेशानी नहीं हो।”
-डॉ आरएल सुमन, अधीक्षक एमबी हॉस्पिटल “जो गर्भवती एमबी हॉस्पिटल में पहुंचती है, वह पूरे जिले भर से यहां आती हैं। इसके अलावा सीएचसी-पीएचसी से तो ज्यादा गंभीर स्थिति होने पर यहां ही रैफर किया जाता है।”
-डॉ शंकर बामनिया, सीएमएचओ उदयपुर


