भास्कर न्यूज | चतरा मां भद्रकाली का दरबार इस वर्ष भी नवरात्र में भव्य सजावट से श्रद्धालुओं का मन मोह रहा है। मंदिर का पूरा प्रांगण रंगीन रोशनी से जगमगा उठा है। शाम ढलते ही एक अलौकिक छटा बिखरने लगता है। सुगंधित और कृत्रिम फूलों की आकर्षक सज्जा ने मंदिर परिसर के सौंदर्य को और बढ़ा दिया है। दूधिया और रंगीन रोशनी में नहाया मंदिर का प्रांगण इतना मनमोहक लग रहा है कि यहां आने वाले श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जा रहे हैं। मंदिर की सजावट स्थानीय लोगों ने खुद किया है। इसके लिए बाहर से किसी कलाकार को नहीं बुलाया गया।चतरा जिले के भदुली स्थित मां भद्रकाली का ऐतिहासिक मंदिर नवरात्र के दौरान आस्था और भक्ति का एक अद्भुत केंद्र बन जाता है। इस नौ दिवसीय महापर्व में यहां की पूजा, परंपरा, और महत्व का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जो इसे अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाता है।नवरात्र में यहां की पूजा-अर्चना का विधान पूरी तरह से तांत्रिक और वैदिक पद्धतियों पर आधारित होता है। नवरात्र के नौ दिन मंदिर में विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान मां के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र पर कई भक्त, साधु, संत दूर दूर से आते हैं और नौ दिनों तक निराहार या फलाहार रहकर माता की साधना करते हैं। नवरात्र के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना की जाती है। इस कलश को देवी का प्रतीक माना जाता है और इसे नौ दिनों तक अखंड ज्योति के साथ स्थापित रखा जाता है। अखंड ज्योति नौ दिनों तक बिना बुझे जलती रहती है। मान्यता है कि यह ज्योति भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करती है। नवरात्र के हर दिन सुबह और शाम को मां भद्रकाली का विशेष श्रृंगार किया जाता है। फूलों, आभूषणों और वस्त्रों से सजी मां की प्रतिमा का श्रद्धालु भक्ति भाव से दर्शन करते हैं। इसके बाद, विशेष महाआरती का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। अष्टमी और नवमी के बीच संधि काल में विशेष पूजा और संधि बलि का आयोजन होता है। इसी दिन कन्या पूजन का भी विधान है। इसमें छोटी बच्चियों को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है। नौ दिनों के अनुष्ठान के बाद विजयादशमी के दिन अनुष्ठान का समापन होता है, जिसमें कलश का विसर्जन किया जाता है।


