वाराणसी में वर्ष 2025 की पहली सर्द रात 10 डिग्री तापमान में कैंट रेलवे स्टेशन – मालगोदाम रोड पर खुले आसमान के नीचे लगभग दो दर्जन परिवार सोते मिले। जहां ये परिवार लगातार गिर रहे ओस के बीच मच्छरदानी में एक कम्बल के सहारे रात गुजार रहे थे, महज दस कदम की दूरी पर ही नगर निगम का शेल्टर होम है। जब दैनिक भास्कर वहां पहुंचा तो शेल्टर होम में सिर्फ 1 व्यक्ति सोता मिला जबकि 17 बेड खाली पड़े थे। डीएम 31 की रात गए थे शेल्टर होम देखने प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक लगातार कह रहे कि ठंड में कोई खुले आसमान के नीचे न सोए, ठंड से बचाव के लिए अलाव से लेकर हर संभव प्रयास किए जाएं। पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी जिलाधिकारी एस राजलिंगम ने 31 दिसम्बर की रात सेंट्रल जेल रोड पर सिकरौल इलाके में बने नगर निगम के शेल्टर होम का दौरा किया था। व्यवस्था चाक चौबंद मिली थी। दैनिक भास्कर वर्ष की पहली रात शिवपुर से कैंट तक यह देखने निकले कि 10 डिग्री तापमान में नगर निगम के दावे में कितनी सच्चाई है। सार्वजनिक स्थानों पर अलाव जल रहे या नहीं। आइए जानते हैं दावे में कितना दम छह किलोमीटर के सफर ने बयां की हकीकत दिन : 01 जनवरी समय : रात के 10: 42 स्थान : शिवपुर रामलीला मैदान शिवपुर में अष्टभुजी मंदिर के बाहर नगर निगम की धर्मशाला है जहां रामलीला होती है, पंचक्रोशी मार्ग पर मौजूद इस रामलीला मैदान में सात बुजुर्ग महिला और पुरुष छज्जे के नीचे सोते मिले। इनका कोई ठिकाना नहीं इसलिए ये बर्फीली हवाओं के बीच छज्जे के नीचे रात गुजारने को विवश हैं। नगर निगम तो नहीं आया, भगवान ही आ गए सोनभद्र की सोना देवी ने बताया कि वह चार- पांच महीने से यहीं रहती हैं। नगर निगम की तरफ से तो कभी अलाव नहीं जला, न कोई कंबल मिला। भगवान का भला हो कि रामलीला मैदान में भागवत करने वालों ने उन लोगों को आज कम्बल दिया जिससे ठंड से थोड़ी राहत मिली है। चंदौली के सैयदराजा से तारा देवी बीते आठ दिन से हैं। इन्हें भी सात दिन बाद नए वर्ष में कंबल मिला तो बूढ़ी हड्डियों में थोड़ी गर्माहट आई जिससे ठिठुरन थोड़ी कम हुई। सोनभद्र से रंभा देवी भी दस दिन पहले आईं और यहीं ठहरी हैं। बोलीं कि आज मानो भगवान ही आ गए, ठंड के मारे बुरा हाल था, गरम कपड़े भी ऐसे नहीं जो इतनी ठंड में राहत दे सके। कम्बल ने बहुत सहारा दिया। कचहरी चौराहे पर भी नहीं दिखा अलाव 11:15 बजे शिवपुर के बाद अगला पड़ाव था तीन किलोमीटर दूर गोलघर कचहरी। इस तीन किलोमीटर के रास्ते में सिर्फ एक स्थान गिलट बाजार पुलिस चौकी पर अलाव दिखा। चौराहे पर लगभग 100 से अधिक लोग चाय- पान और फास्ट फूड की दुकानों पर होंगे लेकिन देर रात तक व्यस्त रहने वाले इस चौराहे पर अलाव कहीं नहीं दिखा। लोग चाय की भट्ठियों को घेरे थे ताकि ठंड का एहसास थोड़ा कम हो। 11:30 बजे आए थे बाबा के दर्शन को, परिवार संग ठिठुरे कचहरी से ढाई किलोमीटर दूर चौधरी चरण सिंह बस टर्मिनल में भी बर्फीली हवाओं के बीच यात्री ठिठुरते दिखाई दिए। रात में साढ़े 11 बजे सोनभद्र के अमरनाथ यादव अलाव खोज रहे थे ताकि ठंड से ठिठुर रहे बच्चों को थोड़ी गर्माहट मिल जाए। परिवार के साथ काशी विश्वनाथ का दर्शन करने वाराणसी आए अमरनाथ ने दावा किया कि उन्हें तो मंदिर से लेकर बस स्टेशन तक कहीं अलाव देखने को ही नहीं मिला। बर्फीली हवाओं के बीच स्टेशन पर एक तरफ अमरनाथ का परिवार था तो बगल में ही गोरखपुर के तारकेश्वर जो दवा लेने वाराणसी आए थे। बताया स्टेशन पर थोड़ी देर पहले आए हैं लेकिन अलाव नहीं दिखा। हमारे गाजीपुर में तो बढ़िया व्यवस्था नगर निगम के दावे की पोल खोली गाजीपुर डिपो के चालक शैलेंद्र सिंह। बताया कि यहां तो ठंड से बचने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं है। अलाव कभी जलते देखा ही नहीं यात्रियों के लिए। गाजीपुर में तो बस चालक और यात्रियों दोनों के लिए ठंड से बचाव के सारे इंतजाम हैं। 11 : 45 बजे कैंट रेलवे स्टेशन पर भी कागजी अलाव बस स्टेशन का हाल जानने के बाद अगला नंबर था कैंट रेलवे स्टेशन का। पौने बारह बजे मुलाकात हुई कुली सुकेन्द्र कुमार से। परिवार का पेट पालने के लिए सुबह से देर रात तक यात्रियों का सामान ट्रेन में चढ़ाने – उतारने का काम करते हैं। बताया कि नगर निगम की तरफ से तो कभी अलाव नहीं जलता है। कभी कभी ऑटो वाले लकड़ी का जुगाड करके आग जलाते हैं तो हम लोग भी गर्माहट लेने की कोशिश करते हैं। 12 बजे शेल्टर होम में एक शख्स, बाहर दो दर्जन परिवार स्टेशन – मालगोदाम रोड पर नगर निगम का एक शेल्टर होम है। वहां एक शख्स सोता मिला, केयर टेकर मनोज मिले , कमरा खोलकर दिखाया। कमरे में व्यवस्था ठीक थी, एक शख्स सोता मिला जबकि अन्य बेड खाली थे। शेल्टर होम से निकलने के बाद सड़क किनारे नजर पड़ी तो 10 डिग्री टेंप्रेचर भी कम अधिक लगने लगा। सड़क किनारे दोनों तरफ एक दर्जन से अधिक परिवार खुले आसमान के नीचे टेंट जैसे दिखने वाले मच्छरदानी में कंबल ओढ़कर सोते मिले। बर्फीली हवाओं के साथ आसमान से गिर रहे ओस के बीच महिला पुरुष अपने बच्चों के साथ सो रहे थे। पूछने पर पता चला कि खुले आसमान में सोने वाले ये परिवार दिनभर सड़कों पर घूम घूमकर सामान बेचते हैं और रात में यहीं सड़क किनारे टेंटनुमा मच्छरदानी में रहते हैं।


