झारखंड में यूनिवर्सिटी में 500 से अधिक नीड बेस्ड महिला असिस्टेंट प्रोफेसरों को न तो मातृत्व अवकाश मिल रहा है और न ही स्पेशल लीव। जबकि अनुबंध कर्मचारियों को भी मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है। अवकाश के साथ ही न तो इनका पीएफ जमा होता है और न ही हाउस रेंट का भुगतान किया जाता है। ये करीब आठ साल से सेवा दे रही हैं। स्थाई असिस्टेंट प्रोफेसर की तरह सुबह 10:30 बजे से शाम 5 बजे तक काम करती हैं। क्लास लेने के साथ सिलेबस तैयार करने, कॉपियों का मूल्यांकन और अन्य एकेडमिक जिम्मेदारी भी इन्हीं के कंधे पर हैं। इन्हें प्रतिमाह 55 हजार रुपए भुगतान किया जाता है। -शेष पेज 7 पर इन लाभ से वंचित हैं नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर स्थाई प्रोफेसर की तरह सेवा दे रहे, पर लाभ नहीं हम स्थायी प्रोफेसरों की तरह ही सेवा दे रहे हैं। क्लास, परीक्षा, कॉपी जांच… सब कुछ करते हैं। लेकिन आठ साल बाद भी एक भी लाभ नहीं मिलता। जिला अध्यक्ष रिंकू शाही बताते हैं कि स्थायी प्रोफेसरों जैसा पूरा अकादमिक काम दिया जाता है, पर पीएचडी करने का अधिकार तक नहीं मिला। -निरंजन महतो, प्रदेश अध्यक्ष, नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर एसोसिएशन 1️. पीएफ (भविष्य निधि) का अधिकार : पीएफ न कटना सिर्फ एक सुविधा का अभाव नहीं, यह भविष्य की सुरक्षा छीन लेना है। 8 साल की सेवा के बाद भी पीएफ मद में राशि नहीं कटने से इन शिक्षकों में निराशा है। भविष्य असुरक्षित समझ रहे हैं। 2️. मेडिकल लीव नहीं मिलता : शिक्षक बीमार पड़ते हैं तो या तो बिना वेतन बैठना पड़ता है या बीमार में काम पर आकर अपनी सेहत और बिगाड़ते हैं। इनका कहना है कि यह किसी भी पेशे में सबसे अमानवीय स्थिति है। 3️: महिलाओं को स्पेशल लीव न मिलना : दोहरे अन्याय की कहानी मातृत्व या विशेष परिस्थितियों से जुड़ी छुट्टियां शिक्षा जगत में भी अनिवार्य होती हैं। लेकिन इन महिला शिक्षकों के लिए शारीरिक पीड़ा और नौकरी की असुरक्षा साथ-साथ चलती है। 4️. अर्जित अवकाश नहीं मिलता : धूप, धूल, बारिश में चार-चार पीरियड क्लास लेने वाले ये शिक्षक एक दिन भी अर्जित छुट्टी नहीं ले सकते। नियमित शिक्षकों को अर्जित अवकाश देने का प्रावधान है। इन शिक्षकों कहना है कि हमारे लिए आराम सिर्फ एक शब्द है, वास्तविकता नहीं। 5️. हाउस रेंट नहीं मिलता : महंगाई के दौर में घर का किराया देना बड़ा बोझ है। स्थायी प्रोफेसरों को एचआरए का सुविधा प्राप्त है। लेकिन स्थायी शिक्षकों की तरह काम करने वाले इन शिक्षकों को एचआरए की सुविधा नहीं दी जाती है। इनका कहना है कि किराए और जरूरतों के बीच महीना काटना मुहाल हो जाता है। 6️. पीएचडी कराने का अधिकार नहीं : नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर का अकादमिक भविष्य रोक दिया गया है। पीएचडी प्रोडक्शन के बिना एकेडमिक करियर बेहतर नहीं हो सकता है। एक ओर राज्य में शोध गाइडों की भारी कमी है।


