छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा की जीत बड़ी इस वजह से है क्योंकि 10 नगर निगमों में से सभी 10 पर भाजपा ने कब्जा जमाया है। 49 नगर पालिकाओं में 35 में बीजेपी, 8 में कांग्रेस, 1 में आम आदमी पार्टी 5 में निर्दलीयों को जीत मिली। 114 नगर पंचायत में 81 में भारतीय जनता पार्टी, 22 में कांग्रेस 1 में बसपा और 10 पर निर्दलीयों को जनता ने चुना है। इस जीत की वजह पांच बड़ी रहीं। निकाय चुनाव को ध्यान में रखते हुए 6 से 7 महीने पहले से ही मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और नगरीय प्रशासन मंत्री के तौर पर अरुण साव की जोड़ी काम पर जुटी हुई थी। प्रदेश के हर जिले में जनता के बीच ये बात स्थािपत करने का प्रयास किया गया कि काम हो रहा है। 14 महीने की भाजपा सरकार ने 7400 करोड़ के प्रोजेक्ट दिए। इसका असर हुआ। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल उतनी मजबूती से निकाय चुनाव लड़ते दिखाई नहीं दिए। कुछ अन्य फैक्टर भी रहे जिसकी वजह से BJP को यह बड़ी जीत मिली, पढ़िए इस रिपोर्ट में। हर जिले में लोकार्पण कार्यक्रम
भारतीय जनता पार्टी में रायपुर से लेकर बस्तर और सरगुजा तक हर जिले में लोकार्पण कार्यक्रम किए। जानबूझकर यह कार्यक्रम शहरी इलाकों में किए गए। उस इलाके के जनप्रतिनिधि के साथ मुख्यमंत्री विष्णुदेव और नगरीय प्रशासन विभाग के मंत्री होने के नाते अरुण साव मंचों पर दिखाई देते थे। इन कार्यक्रमों में सड़क, नाली, सामुदायिक भवन, पानी की टंकी, स्कूल-हेल्थ सेंटर के लिए बिल्डिंग जैसे प्रोजेक्ट्स का ही लोकार्पण और भूमि पूजन किया जाता था। इसके जरिए भाजपा यह बताने की का प्रयास करती रही कि कांग्रेस के दौर में कोई काम नहीं हुआ अब आगे काम होगा, इसका असर वाेटर पर पड़ा। विपक्ष कंफ्यूज दिखा
नवंबर 2024 आते-आते छत्तीसगढ़ में निकाय चुनाव को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति बनती रही । कभी दिसंबर तो कभी जनवरी तो कभी फरवरी में चुनाव होने की बातें सामने आती रहीं। कांग्रेस यह कहती रही कि सरकार चुनाव करवाना नहीं चाहती। मगर भारतीय जनता पार्टी निकाय चुनाव के लिए तैयारी शुरू कर चुकी थी। संगठन में 20 से ज्यादा समितियां बनाकर प्रदेशभर में प्रत्याशी चयन, घोषणा पत्र तैयार करने का काम हो रहा था। तब तक कांग्रेस ऐसी तैयारी में नही थी। कांग्रेस के भीतरी हालात का अंदाज इस बात से लगाइए कि नामांकन की आखिरी तारीख से ठीक पहले वाली रात तक प्रत्याशियों के नामों का एलान पूरी तरह नहीं हो सका था। पूरे चुनावी अभियान में विपक्ष कंफ्यूज और बैकफुट पर ही नजर आया इसका असर वाेटर पर पड़ा। कांग्रेस का काम बागियों ने भी खूब बिगाड़ा। इस चुनाव में पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ने के अलावा कई कांग्रेसी नेता ऐसे भी रहे जिन्होंने ठीक से नामांकन दाखिल नहीं किया । उनके नामांकन रिजेक्ट हो गए । जैसे धमतरी महापौर प्रत्याशी विजय गोलचा का नामांकन डॉक्यूमेंटेशन की कमी की वजह से रद्द हो गया। कोंडागांव में वोटिंग से 2 दिन पहले सुभाष चंद्र वार्ड की कांग्रेस प्रत्याशी पूर्णिमा भाजपा में शामिल हो गई । इसी तरह का माहौल पूरे प्रदेश में रहा राजधानी रायपुर में मेयर इन काउंसिल में शामिल रहे कांग्रेस नेता बंटी होरा, जितेंद्र अग्रवाल, आकाश तिवारी ने कांग्रेस के खिलाफ ही चुनाव लड़ा। इससे पूरे प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने का काम कांग्रेस के ही नेताओं ने जाने-अनजाने में कर दिया। घोषणाओं का वोटर पर असर
कांग्रेस से पहले भाजपा अपना घोषणा पत्र लेकर आई। जिलों की लोकल समस्याओं के हिसाब से भी अलग घोषणा पत्र जारी किया गया। इसमें महिलाओं के नाम पर प्रॉपर्टी होने पर टैक्स में छूट देने, पट्टा मालिकों को जमीन का मालिक बनाने जैसी बातों का शहरी और ग्रामीण इलाकों पर असर दिखाई दिया। भाजपा विधानसभा चुनाव के बाद दोबारा से महतारी वंदन योजना को भुनाती दिखी, महिलाओं के बीच यह बात पहुंचाई गई कि निकाय चुनाव के बाद जिन महिलाओं को महतारी वंदन का पैसा नहीं मिलता उन्हें भी मिलेगा । कई जगहों पर आचार संहिता के दौरान फार्म भरवाने के मामले सामने आए, पट्टे पर रहने वालों से भी मालिकाना हक दिलाने का फॉर्म भरवाया जाता रहा। इसका वोटर पर साइक्लॉजिकल असर पड़ा। माहौल बनाने में BJP आक्रामक
रायपुर में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशियों के लिए नामांकन रैली निकाली। ऐसा कोई आयोजन कांग्रेस पार्टी की ओर से नहीं हुआ। कांग्रेस महापौर पद की प्रत्याशी दीप्ति दुबे स्कूटी पर नामांकन दाखिल करने गईं, सादगी के लिहाज से ये चर्चा में जरूर आया। मगर इसका असर हुआ कि माहौल भारतीय जनता पार्टी लूट ले गई। रायपुर में मुख्यमंत्री ने रोड शो भी किया । मगर ऐसा कोई आयोजन कांग्रेस की तरफ से नहीं हुआ । यह स्थिति लगभग पूरे प्रदेश में रही । जिस आक्रामकता से भीड़ जुटाकर भारतीय जनता पार्टी सभा और रोड शो करती देखी गई, कांग्रेस ये करने में काफी पीछे रही।
कांग्रेस ने एंटी इंकमबेंसी झेली
रायपुर समेत प्रदेश के अन्य नगर निगमों में भी कांग्रेस का सुपड़ा साफ हुआ है। कांग्रेस को इस बार एंटी इंकम्बेंसी भी झेलनी पड़ी। उदाहरण के तौर पर रायपुर की स्थिति समझें तो यहां 15 सालों से कांग्रेस का महापौर ही रहा । भाजपा को लगातार महापौर चुनाव में हार ही मिली। एंटी इनकंबेंसी के चलते इस बार बीजेपी को मतदाता ने भर-भर के अपना सपोर्ट दिया । यह ट्रेंड भी रहा है कि छत्तीसगढ़ में जिसकी सरकार होती है निकायों में उसे कामयाबी मिलती है।


