आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू)-एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) में 25 साल में 1 लाख से ज्यादा शिकायतें हुईं, लेकिन 1600 केस ही दर्ज किए गए। बावजूद 30 साल पुराने करीब 24 बड़े केस अभी भी लंबित हैं। इनमें कुछ तो की तो 10-12 साल से फाइल ही नहीं खुली है। इनमें राज्य का सबसे पहला धान खरीदी घोटाला शामिल है जिसे 2003-04 में दर्ज किया गया था। इसके अलावा रिटायर्ड आईएएस बीएल अग्रवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप का केस 2010 से लंबित है, जबकि सीबीआई और ईडी भी अग्रवाल के खिलाफ नया केस दर्ज कर चुकी है। बिजली विभाग के एक अफसर के खिलाफ दर्ज केस तो ऐसा है जो 30 साल से पेंडिंग था। सबूत नहीं मिले तो अब कोर्ट में खात्मा पेश की गई। कई चर्चित केस ऐसे हैं जिनमें इतने तगड़े सबूत हैं कि जांच की दूसरी एजेंसियों ने भी केस दर्ज कर लिया। पर ईओडब्लू ने चालान पेश नहीं किया। भास्कर बता रहा कुछ केस जो 2005 के पहले दर्ज हुए। छापे के 30 साल बाद कोर्ट में चालान: 1995 में डीडी भूतड़ा पर भोपाल में भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया। जांच रायपुर ईओडब्ल्यू को सौंपी गई। उसने 13 सितंबर 1995 को भूतड़ा के बिलासपुर स्थित निवास और उनके अन्य परिसरों पर छापेमारी की। उनके पास बिलासपुर में चावल मिल, कई जमीनें होने का पता लगा। पांच लाख की नकदी मिली। केस का चालान 30 साल बाद अब दायर हुआ, जबकि अफसर 22 साल पहले रिटायर हो चुके हैं। जितना रकबा नहीं उससे ज्यादा खरीदा धान, जांच खत्म नहीं हो रही ग्रामीणों के नाम 400 से ज्यादा खाते खोले, 15 साल में चालान ही पेश नहीं हो सका: रिटायर्ड आईएएस अधिकारी बीएल अग्रवाल के खिलाफ 2010 में मामला दर्ज कर छापेमारी की गई। पता चला अग्रवाल ने खरोरा इलाके के 446 ग्रामीणों के नाम से बैंक खाते खोले, जिनका इस्तेमाल काले धन को सफेद करने के लिए किया गया। खाते जिनके नाम से खोले गए थे उन्हें पता नहीं था और पैसे जमा हो गए। बैंक खातों में से नकदी अग्रवाल की शैल कंपनियों में निवेश के रूप में स्थानांतरित की गई। 40 करोड़ के बैंक जमा और फर्जी खातों से जुड़े धन का पता लगा था। ईडी ने अब 27 करोड़ की संपत्ति जब्त की है। ईओडब्ल्यू ने अब तक चालान पेश नहीं किया है। 2002 में अजीत जोगी सरकार के कार्यकाल में धान खरीदी के आदेश दिए गए। उसी समय खरीदी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। 2003 में प्रदेश में भाजपा की रमन सरकार बनी और धान खरीदी में घोटाले का मामला सामने आया। प्रारंभिक जांच में पता चला कि राज्य में जितने रकबे में खेती होती थी, उससे ज्यादा की धान खरीदी की गई। इसके लिए रकबे से ज्यादा बारदाने भी खरीद लिए गए। सरकार ने ईओडब्ल्यू-एसीबी को जांच के आदेश दिए। लेकिन अब तक घोटाले की रकम का ही खुलासा नहीं हुआ। भ्रष्टाचार साबित करने सबूत ही नहीं, जुटा सके, इसलिए फाइल अटका दी
30 साल पहले 1996 में तत्कालीन मप्र ईओडब्ल्यू की टीम ने एमपीईबी के कार्यपालन अभियंता पर छापेमारी की। उनके घर के अलावा करीबी रिश्तेदारों और कार्यालय में भी दबिश दी गई। जांच के बाद जमीनों से संबंधित कुछ दस्तावेज, नगदी और लेन-देन के प्रमाण मिलने का दावा किया गया। पर हैरानी की बात है कि 30 साल में भ्रष्टाचार प्रमाणित करने सबूत ही नहीं मिले तो उनके केस की फाइल डंप कर दी। करीब 10 साल से तो एक बार भी फाइल खोली नहीं गई। 10 हजार शिकायतें 23 साल से ज्यादा पुरानी
ईओडब्ल्यू-एसीबी में 1 लाख से ज्यादा शिकायतें डंप पड़ी हैं। इनमें 2000-2002 की दस हजार से ज्यादा शिकायतें हैं। जांच करना तो दूर उन्हें खोलकर तक नहीं देखा गया है। अब जब इन शिकायतों के पुलिंदे खोले जा रहे हैं तो पता चला कि ज्यादातर शिकायतें 400-500 रु. मांगने की है। सीधी बात – अमरेश मिश्रा आईजी ईओडब्ल्यू फाइल डंप करना गलत ईओडब्ल्यू में 30-30 साल से क्यों अटके हैं केस?
जवाब- ये जवाब तो पूर्व अधिकारी दे सकते हैं। केस पेंडिंग रखना गलत है। अब पुराने केस का क्या होगा?
जवाब- हमने पिछले साल 7-8 चालान किए। जिसमें केस बनेगा चालान करेंगे नहीं तो खात्मा भेजेंगे।


