आज महिलाएं हर क्षेत्र में सिर्फ पुरुषों से मुकाबला ही नहीं कर रही हैं, बल्कि उनसे बेहतर खुद को साबित भी कर रही हैं। शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र बाकी है, जिसे महिलाओं ने अपनी सफलता के रंग में न रंगा हो। बात चाहे यूपीएससी की हो या न्यायालय का कठिन क्षेत्र। बिजनेस की बारीकियां या चिकित्सा जगत। मनोरंजन की दुनिया हो या साहित्य, शिक्षा या फिर पुलिस-प्रशासन। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम झारखंड के अलग-अलग क्षेत्रों की उन महिलाओं की सफलता की कहानी बता रहे हैं, जो पुरुषों के सिर्फ समकक्ष ही नहीं, बल्कि उनसे कई कदम आगे खड़ी हैं। अंतरिक्ष को नापने वाली स्त्री हो या सड़क पर पत्थर तोड़ती महिला, सभी नारी शक्ति का प्रतीक रांची की नैंसी सहाय ने 2014 में आईएएस की परीक्षा में 36वां रैंक लाकर नया कीर्तिमान बनाया था। उस समय वह झारखंड मूल की एकमात्र लड़की थी, जिसने यूपीएससी क्रेक की। पिता प्रो. प्रकाश सहाय योगदा सत्संग कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर व पत्रकार व मां राजलक्ष्मी सहाय शिक्षिका व साहित्यकार हैं। उन्होंने बताया कि मैंने अपनी नब्बे साल की दादी को देखा था कि अपने एक इशारे से घर-परिवार के लोगों को समझा देती थी कि क्या करना है और क्या नहीं। मेरी दादी अपने पास गोद में बिठा कर कहती थी ‘पढ़ो…मैं तुम्हारे साथ जागती हूं…’। 10वीं बोर्ड परीक्षा में मैंने राज्य भर में सर्वोच्च अंक लाया। यदि मैं अपना मूल्यांकन करूं तो उपायुक्त की कुर्सी पर पहुंचने की यात्रा घर के आंगन से शुरू हुई। चाहे सड़क पर पत्थर तोड़ती श्रमिक महिला हो या अंतरिक्ष को नापने वाली स्त्री, सभी नारी शक्ति का प्रतीक हैं। वकालत में आई तो मात्र 12 लड़कियां थीं, आज 10 हजार से ज्यादा झारखंड में लड़ रही हैं केस ऋतु कुमार सीनियर वकील ही नहीं देश के किसी भी एडवोकेट एसोसिएशन की एकमात्र प्रेसिडेंट हैं। कहती हैं कि मेरी मां वीणा कुमार होममेकर थीं और पिता उपेंद्र कुमार एसईसीएल में सीएमडी थे। शुरू से लॉ में रुचि थी, लेकिन मुझे यूपीएससी की तैयारी करनी थी। मैंने दिल्ली के लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। शादी पढ़ाई के दौरान हो गई। फिर पटना हाईकोर्ट के रांची बेंच में 1991 में ज्वॉइन किए। यहां मैं 12वीं महिला एडवोकेट थी। उस समय महिला वकीलों के लिए बहुत स्ट्रगल था, क्लाइंट का विश्वास औरतों पर नहीं होता था। समय के साथ हमने क्लाइंट का विश्वास हासिल किया। आज 10 हजार से ज्यादा महिलाएं झारखंड में वकालत कर रही हैं। 2018 में झारखंड हाईकोर्ट के एडवोकेट एसोसिएशन की मैं पहली महिला प्रेसिडेंट बनी। देश में कहीं भी किसी एडवोकेट एसोसिएशन में दूसरी महिला प्रेसिडेंट नहीं है। लड़की शादी करने की जगह पढ़ना चाहती थी, उसका एडमिशन स्कूल में कराया, किताबें दी 2017 में रिष्मा रमेशन आईपीएस बनीं। फिलहाल पलामू एसपी के रूप में पदस्थापित हैं। अपनी निर्भीक कार्यशैली व महिलाओं के लिए कार्य करने के लिए जानी जाती हैं। इस महिला दिवस वह पलामू एसपी ऑफिस के विजिटिंग रूम में फीडिंग व किड्स प्लेइंग एरिया बना रही हैं। कहती हैं कि मेरे पास दूर-दूर से महिलाएं आती हैं, कई बार मैं फील्ड में होती हूं तो वह घंटों इंतजार करती हैं। मांओं के लिए मैं फीडिंग रूम बनवा रही हूं। हाल ही में उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र मनातू से एक लड़की का फोन आया। उसने कहा कि वह पढ़ना चाह रही है, लेकिन घर वाले उसकी शादी करवा रहे हैं। मैंने महिला थाना प्रभारी को उसके घर भेजा। लड़की का एडमिशन स्कूल में कराया और पढ़ने के लिए कॉपी-किताब, ड्रेस व अन्य जरूरी सामग्री दी। लड़की आगे जज बनना चाहती हैं। मेडिकल की प्रैक्टिस के साथ प्रकृति से जुड़कर बनीं एंटरप्रेन्योर… ऑर्गेनिक फार्मिंग को दे रही हैं बढ़ावा डॉ. मीनाक्षी सिंह पेशे से दंत चिकित्सक हैं। सफल महिला उद्यमी के रूप में पहचान स्थापित की है। वह चिकित्सा सेवा के अलावा पर्यावरण संरक्षण व ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने व इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए ठाकुरगांव में 7 एकड़ में नंदिनी गिर फॉर्म्स की स्थापना की है। यहां जैविक फसलों का उत्पादन किया जाता है। आगे वह ऑर्गेनिक स्वीट्स, मिलेट्स आदि के क्षेत्र में भी शोध कर रही हैं। करीब 4 हजार फलदार, छायादार व औषधीय पौधे लगाकर पर्यावरण के क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं। कहती हैं कि डॉक्टर होने के नाते मैं केमिकल के कारण हो रही परेशानियों को जानती हूं। नंदिनी गिर फॉर्म्स शुरू करके लोगों के बीच आर्गेनिक चीजों के सेवन को लेकर जागरूकता चला रही हूं। ऑर्गेनिक बास्केट से स्टार्टअप शुरू की हूं। इसके साथ ‘मीनाक्षी नेत्रालय’, ‘गरुड़ आई हॉस्पिटल’ और ‘दिव्यम आई हॉस्पिटल’ की स्थापना कर वहां मरीजों का इलाज करती हूं।


