भास्कर न्यूज़ | लुधियाना। नगर निगम लुधियाना के वार्ड 73 की महिला पार्षद रुचि गुलाटी ने शहर के प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग, नई दिल्ली को औपचारिक शिकायत भेजी है। उनका कहना है कि नगर निगम में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के बावजूद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर एक संगठित तरीके से महिला सशक्तिकरण को कमजोर किया जा रहा है। गुलाटी ने आरोप लगाया कि पंजाब की राजनीति और प्रशासन में आज भी पुरुष प्रधान मानसिकता इस कदर हावी है कि चुनी गई महिला पार्षदों को न तो स्वतंत्र निर्णय लेने दिया जाता है और न ही उन्हें दी गई शक्तियों का उपयोग करने दिया जाता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की शक्तियां छीनी जा रही हैं, दूसरे लोग उनके अधिकारों तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सोमवार को वार्ड नंबर 73 में उनके साथ हुए विवाद के बाद, आम आदमी पार्टी के नेता द्वारा की गई बदसलूकी पर उन्होंने थाना डिवीजन नंबर 5 में शिकायत दर्ज करवाई। इसके बाद निगम कमिश्नर आदित्य डेचलवाल के निवास स्थान पर धरना भी दिया, जिस पर मेयर प्रिंसिपल इंद्रजीत कौर मौके पर पहुंचीं और कार्रवाई का आश्वासन दिया। महिला पार्षद गुलाटी ने यह भी आरोप लगाया कि उनके वार्ड से चुनाव हार चुकी विपक्षी प्रत्याशी के बेटे को उनकी प्रशासनिक शक्तियों का अनाधिकृत उपयोग करने दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वे पार्षद चुनी गई हैं, लेकिन प्रशासन उनके अधिकार किसी और को दे रहा है। इससे न सिर्फ उनका अपमान हुआ है, बल्कि इलाके की महिलाओं का मनोबल भी टूट रहा है। गुलाटी ने ये भी कहा कि कई राजनीतिक दलों में महिला पार्षद चुनाव तो लड़ती हैं, लेकिन फैसले उनके पति या पुरुष प्रतिनिधि लेते हैं। इसे उन्होंने महिला नेतृत्व को कमजोर करने की सोची-समझी परंपरा बताया। उन्होंने मेयर प्रिंसिपल इंद्रजीत कौर पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि मेयर महिला हैं, लेकिन काम वही होता है जो पुरुष प्रधान राजनीतिक समूह तय करता है। अपनी शिकायत में गुलाटी ने पंजाब में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बढ़ते वीडियो का भी उल्लेख किया और कहा कि प्रशासन इन मामलों में संवेदनहीन बना हुआ है। यह सिर्फ एक पार्षद की लड़ाई नहीं, पंजाब की हर महिला की आवाज है। अब हमारी आखिरी उम्मीद महिला आयोग है। हम महिलाएं अपने अस्तित्व और संवैधानिक अधिकारों को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। नगर निगम लुधियाना में कुल 95 वार्ड हैं, जिनमें 50% सीटें महिला आरक्षण के तहत आती हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर महिला प्रतिनिधियों के नाम पर उनके पति, रिश्तेदार या किसी राजनीतिक समूह द्वारा निर्णय लेने की शिकायतें पहले भी उठती रही हैं, जिसे गुलाटी ने महिलाओं को ‘नाम मात्र की पार्षद’ बनाने का उदाहरण बताया है।


