अमित नाग | बागडेहरी जामताड़ा की उर्वर धरती सदैव कृषि और वानिकी के लिए उपयुक्त रही है। इसी क्रम में जामताड़ा जिले के कुंडहित एवं फतेहपुर वन क्षेत्र में वन विभाग द्वारा वर्ष 2008-09 में बड़े पैमाने पर काजू के पौधे लगाए गए थे। आज ये पौधे वृक्षों का रूप ले चुके हैं और इनमें भरपूर मात्रा में काजू के फल लग रहे हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतनी अधिक उपज के बावजूद भी क्षेत्र में काजू की प्रोसेसिंग यूनिट नहीं होने से ये मूल्यवान फल बर्बादी की कगार पर है। वन विभाग ने कुंडहित और फतेहपुर वन क्षेत्रों में लगभग 100 हेक्टेयर भूमि पर काजू के पौधे लगाए हैं। बताया जाता है कि यहां एक लाख से भी अधिक काजू के पेड़ लगे हैं। पुरुषोत्तमबाटी, धनभस्का, खजूरी और आसपास के जंगलों में बड़े पैमाने पर काजू की बागवानी की गई है। यहां तक कि खजूरी की जमाबंदी जमीन पर टैगोर समिति द्वारा भी काजू का बागान विकसित किया गया है। हालांकि इन सभी प्रयासों का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पा रहा है, क्योंकि काजू की प्रोसेसिंग की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है।


