राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस फरजंद अली ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति पाने के लिए परिवार का ‘सड़क पर आ जाना’ या ‘भिखारी जैसी हालत’ में होना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा, “करुणा को अंकगणित के खेल में नहीं बदला जा सकता।” हाईकोर्ट ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (अब पीएनबी में मर्ज) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक मृतक कर्मचारी के बेटे को केवल इसलिए नौकरी देने से मना कर दिया गया था, क्योंकि परिवार को रिटायरमेंट बेनेफिट्स के तौर पर करीब 34 लाख रुपए मिले थे। बैंक का तर्क: 34 लाख मिले, गरीब नहीं हो मामला श्रीगंगानगर के रहने वाले हरजीत सिंह का है। उनके पिता दर्शनसिंह बैंक में असिस्टेंट मैनेजर थे, जिनकी 37 साल की सेवा के बाद 17 जनवरी 2019 को बीमारी से मौत हो गई थी। वे परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। ग्रेजुएट बेटे ने 19 मार्च 2019 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। तब बैंक ने 1 अक्टूबर 2019 को हरजीतसिंह के आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया कि परिवार को ग्रेच्युटी और पीएफ मिलाकर करीब 34.66 लाख रुपए मिले हैं, इसलिए परिवार ‘निर्धन’ या दयनीय स्थिति में (Indigent or Penurious Condition) में नहीं है। फैमिली पेंशन चल रही है, और कोई आश्रित बेटी नहीं है। बैंक की सक्षम समिति ने मृतक की उम्र, 37 साल की लंबी सेवा और अन्य कारकों को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि परिवार योजना के तहत पात्र नहीं है। असलियत: बैंक ने ही काटे 8.58 लाख, 12-15 लाख इलाज पर खर्च याचिकाकर्ता की मां कमलजीत कौर ने 3 अक्टूबर 2019 को पुनर्विचार के लिए रिप्रेजेंटेशन देते हुए वास्तविक स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि ग्रेच्युटी में से बैंक ने ओवरड्राफ्ट लिमिट के 6.99 लाख रुपए, व्हीकल लोन के 1.52 लाख रुपए और फेस्टिवल लोन के 6,253 रुपए काट लिए थे, जिससे कुल मिलाकर 8.58 लाख रुपए की कटौती हुई। इसके अलावा चार साल तक चले इलाज के लिए परिवार ने बजाज फाइनेंस से 5 लाख, मुथूट फाइनेंस से 2.50 लाख और बाजार से 7-8 लाख रुपए का निजी कर्ज लिया था। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि परिवार के पास खुद का मकान नहीं है और वे किराए के मकान में रह रहे हैं। हरजीत सिंह बेरोजगार हैं और परिवार के पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। सभी कर्ज चुकाने के बाद परिवार के पास कुछ नहीं बचा। इसके बावजूद बैंक ने 7 मार्च 2020 को पुनर्विचार भी खारिज कर दिया और कहा कि परिवार अभी भी निर्धन स्थिति में नहीं है। हाईकोर्ट की 4 बड़ी टिप्पणियां जो नजीर बनेंगी: गरीबी का पैमाना: कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) वाली ‘कंगाल’ (Pauper) की परिभाषा यहां लागू नहीं होगी। कोई भी वेतनभोगी कर्मचारी मरने के बाद इतना गरीब नहीं हो सकता कि वह ‘भिखारी’ की श्रेणी में आए। अगर यही पैमाना रहा, तो किसी भी सरकारी कर्मचारी के आश्रित को कभी नौकरी नहीं मिलेगी। भुखमरी का इंतजार नहीं: कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद परिवार को भुखमरी से बचाना है, न कि भुखमरी के हालात पैदा होने का इंतजार करना। टर्मिनल बेनिफिट्स आय नहीं: रिटायरमेंट पर मिला पैसा (PF/ग्रेच्युटी) परिवार की सुरक्षा के लिए होता है, इसे ‘स्थायी आय’ मानकर नौकरी देने से मना नहीं किया जा सकता। योजना का विरोधाभास: कोर्ट ने बैंक की स्कीम के नियम-10 का हवाला दिया, जिसमें लिखा है कि अगर परिवार में कोई कमाने वाला सदस्य हो, तब भी अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है। कोर्ट ने पूछा- जब कमाने वाले के होते हुए नौकरी मिल सकती है, तो फिर बेरोजगार बेटे को ‘गरीब नहीं हो’ कहकर कैसे मना कर सकते हैं? फैसला: 4 सप्ताह में दोबारा विचार करे बैंक कोर्ट ने बैंक के 2019 और 2020 के आदेशों को “दिमाग का इस्तेमाल न करने वाला” (Non-application of mind) बताते हुए रद्द कर दिया। जस्टिस फरजंद अली ने बैंक को निर्देश दिया है कि वह 4 सप्ताह के भीतर मामले पर दोबारा विचार करे और “तर्कसंगत आदेश” जारी कर नियुक्ति प्रदान करे।


