श्रम न्यायालय के आदेश की पालना नहीं करने वाले अफसरों के खिलाफ अभियोजन मंजूरी नहीं देने से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने सवाल उठाया है कि कार्मिक विभाग अभियोजन स्वीकृति के संबंध में पुनर्विचार के लिए क्या मामला दुबारा विभाग को भेज सकता है। जस्टिस जीआर मीणा ने यह निर्देश मुकर्रम हुसैन की याचिका पर दिया। सुनवाई के दौरान आदेश की पालना में कार्मिक सचिव अर्चना सिंह पेश हुई। पीएचईडी के एसीएस की ओर से पालना रिपोर्ट देकर कहा कि प्रार्थी को बकाया भुगतान कर आदेश का पालन कर दिया है। अदालत ने कार्मिक सचिव से पूछा कि अभियोजन स्वीकृति को लेकर कई सालों से विभाग में केस लंबित क्यों रहते हैं। जवाब में कार्मिक सचिव ने कहा कि वे तीन दिन पहले की तबादला होकर आई हैं। ऐसे मामलों को तत्काल निपटाने की कोशिश की जाएगी। जिस पर अदालत ने कहा कि जब अफसरों को बुलाते हैं, तभी पालना की जाती है। क्या हर मामले में अधिकारियों को बुलाया जाए। वहीं अदालत के सामने आया कि कार्मिक विभाग ने मामले को पुनर्विचार के लिए वापस श्रम विभाग को भेजा था। प्रार्थी के अधिवक्ता सीपी शर्मा ने कहा कि यह कानूनी मुद्दा है, क्या डीओपी ऐसे मामलों को पुनर्विचार के लिए वापस विभाग को भेज सकता है? इस पर अदालत ने 11 दिसंबर को इस बिंदु पर दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने को कहा है। गौरतलब है कि 28 मार्च, 2017 को श्रम न्यायालय ने प्रार्थी को 1 अप्रैल, 1982 से अर्द्ध स्थायी करने के आदेश दिए थे। लेकिन विभाग ने आदेश की पालना नहीं की। बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 29 के तहत लेबर कमिश्नर के सामने दायर प्रार्थी के प्रार्थना पत्र पर कमिश्नर ने 5 मार्च, 2018 को कार्मिक विभाग को पत्र लिखकर दोषी अफसरों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति जारी करने के लिए कहा। इसके बाद सात साल तक विभाग ने कमिश्नर के पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की। इस पर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। श्रम न्यायालय के आदेश की पालना नहीं करने का मामला


