अब मल्टी-पैरामेट्रिक अल्ट्रासाउंड से मिलेगी सटीक जानकारी:इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ‘यूएसकॉन 2025’ में रेडियोलॉजी एक्सपर्ट्स ने दी जानकारी, जटिल डायग्नोसिस केस पर हुई चर्चा

आईएफयूएमबी और एएफएसयूएमबी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित 33वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस यूएसकॉन 2025 की शुरुआत जयपुर में हो गई है। इसमें एक्सपर्ट ने कहा कि अल्ट्रासाउंड तकनीक लगातार आधुनिक होती जा रही है और अब इसका नया रूप मल्टी-पैरामेट्रिक अल्ट्रासाउंड मरीजों के लिए वरदान साबित हो रहा है। साधारण अल्ट्रासाउंड जहां केवल अंग की बनावट और मोटे बदलाव दिखाता है, वहीं मल्टी-पैरामेट्रिक अल्ट्रासाउंड एक ही अंग की जांच कई पैमानों पर करके रोग की गहराई से जानकारी देता है। कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन डॉ. डीएस नरूका और डॉ. विनोद गुप्ता ने बताया कि दूसरे दिन डॉ. नितिन ने मुकुंद जोशी ओरेशन और डॉ. बीएस रामामूर्ति ने डॉ. एसके शर्मा ओरेशन दिया। इसके अलावा डॉ. पंकज शर्मा ने स्किन अल्ट्रासाउंड, डॉ. एस सुरेश ने एआई इन यूएसजी, डॉ. रचिता ने फीटल स्पाइन पर सेशन दिया। इस दौरान डॉक्टर्स ने जटिल डायग्नोसिस केस पर भी विचार विमर्श किया और कुछ मुश्किल केसों भी प्रदर्शित किए। नई तकनीक से और स्पष्ट होता निदान
मुंबई के डॉ. नितिन चौबल ने बताया कि इस तकनीक में बी-मोड इमेजिंग से अंग की मूल संरचना देखी जाती है। इसके साथ कलर और स्पेक्ट्रल डॉप्लर से खून के प्रवाह और उसकी गति का आकलन किया जाता है। इलास्टोग्राफी से टिश्यू की कठोरता पता चलती है, जिससे ट्यूमर और फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों की पहचान आसान होती है। वहीं कॉन्ट्रास्ट-एन्हांस्ड अल्ट्रासाउंड द्वारा सूक्ष्म रक्त आपूर्ति और माइक्रोसर्कुलेशन का पता चलता है, जो कैंसर जैसी बीमारियों के निदान में बेहद अहम है। इसके अतिरिक्त 3डी और 4डी इमेजिंग से अंग की त्रि-आयामी तस्वीर मिलती है, जिससे निदान और भी स्पष्ट हो जाता है। मल्टी-पैरामेट्रिक अल्ट्रासाउंड केवल तस्वीर नहीं दिखाता, बल्कि अंग की कार्यप्रणाली, रक्त प्रवाह और ऊतक की प्रकृति तक की जानकारी देता है। इसका उपयोग लीवर, प्रोस्टेट, किडनी, ब्रेस्ट और मस्क्युलोस्केलेटल सिस्टम जैसी जटिल बीमारियों के निदान में तेजी से बढ़ रहा है। फीटल मॉनिटरिंग से बचा सकते शिशु की जान
डॉ. चंदर लुल्ला ने बताया कि गर्भावस्था की शुरुआत में ही महिला का ब्लड ग्रुप और आरएच फैक्टर जांचना जरूरी होता है। अगर महिला आरएच नेगेटिव निकलती है और पति आरएच पॉज़िटिव है तो भ्रूण पर खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में मां का शरीर भ्रूण के रक्त को विदेशी मानकर उसके खिलाफ एंटीबॉडी बना लेता है, जिससे बच्चे को एनीमिया, पीलिया, हार्ट फेलियर या गंभीर अवस्था में हाइड्रॉप्स फीटैलिस तक हो सकता है। अब इस स्थिति से बचाव पूरी तरह संभव है।

गर्भावस्था के दौरान इंडायरेक्ट कूम्ब्स टेस्ट (आईसीटी) के जरिए मां के खून में एंटीबॉडी की जांच की जाती है और समय पर एंटी-डी इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन माँ के शरीर में एंटीबॉडी बनने से रोकता है और शिशु को सुरक्षित रखता है। अगर शिशु में खून की कमी दिखती है तो गर्भ में ही उसे ब्लड चढ़ाया जा सकता है।

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