अल्लाह को इब्राहीम का त्याग पसंद आया, इसलिए कुर्बानी बनी यादगार : मौ. हम्माद

ईद उल अजहा ( बकरीद) का त्योहार 7 जून को मनाया जाएगा। इसे लेकर मस्जिदों और ईदगाहोंे में साफ-सफाई शुरू कर दी गई है। मदरसा इस्लामिया के पूर्व शिक्षक मौलाना मो हम्माद कासमी ने कहा कि कुर्बानी एक अजीम इबादत है। कुर्बानी का यह अमल सुन्नत ए इब्राहीमी कहलाता है और यह इसलिए सुन्नत ए इब्राहीम कहलाता है कि जब अल्लाह ने हजरत इब्राहीम (अ) की परीक्षा ली, उनके दिल में मेरी मोहब्बत ज्यादा है या चहेते बेटे हजरत इस्माइल की और उन्हें ख्वाब में हजरत इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का हुक्म दिया। लिहाजा उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माइल से कहा कि मुझे तुम्हें अल्लाह की राह में कुर्बान करने का अल्लाह की तरफ से हुक्म हुआ है। हजरत इस्माइल ने कहा कि अल्लाह की तरफ से आप को जो हुक्म हुआ है, उसकी तामील में देर मत कीजिए। मुझे सब्र करने वाला पाएंगे। इसके बाद हजरत इब्राहीम हजरत इस्माइल को कुर्बान करने के लिए ले गए। इससे पहले बेटे ने मशवरा दिया कि आप अपनी आंखों पर पट्‌टी बांध लीजिए और मुझे लिटा कर जबहा कीजिएगा, कहीं ऐसा ना हो कि मुझ पर आप की नजर पड़े और मोहब्बत जोश में आ जाए और आप रुक जाए। लेहाजा हजरत इब्राहीम ने बेटे की नसीहत के अनुसार उनकी गर्दन पर छुरी चलाई। लेकिन यह तो अल्लाह की तरह से महज एक आजमाईश थी। जिसमें हजरत इब्राहीम पूरी तरह सफल हुए। अल्लाह ने छुरी को ना काटने का हुक्म दिया। फिर अल्लाह के हुक्म से जन्नत से दुंबा भेजा गया, उनकी जगह दुंबे की कुर्बानी हुई। इस तरह अल्लाह को हजरत इब्राहीम की फरमाबरदारी इतनी पसंद आई कि इसे रहती दुनिया तक के लिए कुर्बानी को यादगार बना दिया। इसके बाद से आज तक कुर्बानी का अमल जारी है। त्याग, एकता और इंसाफ का पैगाम है कुर्बानी : डॉ. मुफ्ती सलमान मस्जिद ए तैयब के खतीब डॉ. मुफ्ती सलमान कासमी ने कहा कि वर्तमान भारत की राजनीतिक स्थिति जहां धार्मिक ध्रुवीकरण, नफरत की राजनीति और अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने की कोशिशें तेज हैं, उसमें ईद उल अजहा का पैगाम और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ईद उल अजहा, जिसे बकरीद भी कहा जाता है, पैगंबर हजरत इब्राहीम (अ.) की उस महान कुर्बानी की याद में मनाई जाती है, जिसमें उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने सबसे प्यारे बेटे को कुर्बान करने का इरादा किया। अल्लाह ने उनकी नीयत और समर्पण को देखकर उनके बेटे की जगह एक जानवर की कुर्बानी को कुबूल फरमाया। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सच्चा ईमान त्याग, न्याय और अल्लाह की रजा के लिए समर्पण में है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि समाज में अमन, इंसाफ और भाईचारे के लिए अपनी जात से ऊपर उठकर कुर्बानी देना जरूरी है। ईद उल अजहा का असल पैगाम केवल जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि जुल्म, नफरत और असमानता के ख़िलाफ इंसाफ और मानवता की कुर्बानी देना है। इस त्योहार पर हमें चाहिए कि हम अपने अंदर झांकें, अपने नफ्स, लालच और डर की कुर्बानी दें और एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश करें जहां हर मजहब, जाति और वर्ग के लोगों को बराबरी, इज्जत और अमन मिले।

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