रविवार की शाम ढलते ही कई युवाओं और बच्चों में सोमवार को लेकर बेचैनी और घबराहट यानी मंडे ब्लूज होने लगता है। मानसिक दबाव बढ़ने पर अब शहर के एक मानसिक विशेषज्ञ के पास ही हर महीने 4 से 5 ऐसे केस पहुंच रहे हैं, जिनमें बेचैनी, नींद न आना, भारी मन, सुकून गायब होना, तेज धड़कन और चिड़चिड़ापन की शिकायत रहती है। ये केवल नौकरीपेशा लोगों तक सीमित नहीं है, स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स भी इस तनाव से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई अपने काम या पढ़ाई को बोझ मानकर करता है और उसमें खुशी नहीं ढूंढ पाता, तो छुट्टी के बाद काम पर लौटना मानसिक तनाव में बदल जाता है। यह तनाव धीरे-धीरे डिप्रेशन और एंग्जाइटी की शक्ल ले सकता है। ऐसे में पेरेंट्स ध्यान रखें कि अगर बच्चा हर संडे उदास हो जाता है या युवा बार-बार मंडे को लेकर टेंशन में रहता है, तो इसे हल्के में न लें। समय पर समझें और मदद लें, ताकि बात डिप्रेशन तक न पहुंचे। अल्कोहल से बचें ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल, लेट नाइट पार्टी, और अल्कोहल जैसी चीजें मंडे ब्लूज को बढ़ा सकती हैं। इसके बजाय सोमवार को लेकर डर की बजाय पॉजिटिव सोच बनाएं, जैसे मैं यह कर सकता हूं या मैं अपना बेस्ट दूंगा। यह आत्मविश्वास बढ़ाता है और तनाव घटाता है। साथ ही मेडिटेशन से फोकस और शांति मिलती है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्या है, जिसे छोटे-छोटे बदलावों से ही ठीक किया जा सकता है। प्लानिंग से स्ट्रेस कम करें मंडे ब्ल्यूज ये निपटने के लिए जरूरी है कि छुट्टी वाले दिन भी सोने-जागने का समय रेगुलर रखें। सुबह उठकर 15-20 मिनट किसी भी एक्टिविटी जैसे डांस, गाना, स्ट्रेचिंग या कॉमेडी शो देखें, जिससे हैप्पी हार्मोन रिलीज हों और मूड अच्छा बना रहे। मंडे के काम की प्लानिंग संडे को ही कर लें, इससे तनाव नहीं होगा और मन भी तैयार रहेगा। इससे स्ट्रेस नहीं होगी। चाहे पढ़ाई हो या ऑफिस का काम, उसे बोझ समझने की बजाय अनुभव और अवसर की तरह लें। चाहे पढ़ाई हो या ऑफिस का काम, उसे बोझ न समझें केस 1: एचआर प्रोफेशनल को छोड़नी पड़ी नौकरी :एक 24 साल की युवती, जो एचआर प्रोफेशनल थी, मंडे ब्लूज की ऐसी शिकार हुई कि उसे सांस लेने में दिक्कत और नींद में परेशानी होने लगी। सोमवार का नाम सुनकर ही घबराहट होती और घुटन महसूस करने लगती। हालात इतने बिगड़ गए कि उसे नौकरी छोड़नी पड़ी और अब वह इलाज ले रही है। केस 2: केमिस्ट्री क्लास से आता तनाव: नौवीं क्लास का एक छात्र हर सोमवार को होने वाली केमिस्ट्री क्लास से इतना डरने लगा कि रविवार की शाम से उसका मूड बिगड़ने लगता। वह खाना नहीं खाता, नींद नहीं आती और सोमवार को थका-थका महसूस करता था। उसे काउंसिलिंग और विषय को इंटरेस्टिंग तरीके से पढ़ाने से राहत मिली। केस 3: मंडे की मीटिंग्स का डर सताता: एक युवक, जो प्राइवेट आईटी कंपनी में काम करता है, रविवार की रात से ही बेचैन हो जाता था। उसे मीटिंग्स और डेडलाइन का डर सताता, नींद नहीं आती और निगेटिव सोच घेरे रहती थी। आत्मविश्वास डगमगाने लगा तो उसने काउंसिलिंग ली और अब धीरे-धीरे हालत सुधर रही है।


