आस्था के केन्द्र पर पर्यावरण की सुध,मंदिर में केले के पत्ते पर भक्तों को परोसा जा रहा भोग

श्री धर्म सास्था मंदिर में चल रहे 77वें संस्था प्रीति समारोह के दूसरे दिन शनिवार को महागणपति हवन के साथ अनुष्ठान का शुभारंभ हुआ। 32 पुरोहित ने महा गणपति महायज्ञ के लिए गणपति, कार्तिक और अय्यप्पा भगवान समेत सभी देवी-देवताओं के लिए 23 कलश स्थापित किए। मंदिर के अध्यक्ष पी एन शंकरन और मुख्य पुजारी विजय भानु के मार्गदर्शन में सभी पूजा-अर्चना एवं हवन संपन्न कराया गया। महाआरती के बाद मंदिर के सदस्यों द्वारा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया गया। शाम को महादीप आराधना की गई।इस दौरान वेद पंडितों द्वारा रुद्र क्रमार्चन एवं वेद मंत्रों का उच्चारण किया गया। पूजा में विधायक सरयू राय एवं सरायकेला-खरसावां के डीसी रविशंकर शुक्ला भगवान मंदिर पहुंचे। पी एन शंकरन एवं मंदिर के अध्यक्ष एन राममूर्ति ने सम्मानित किया। वैज्ञानिक महत्व : केले के पत्ते में कीड़े नहीं लगते हैं। ऐसे में यह दूसरे पेड़ के पत्तों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होता है। केले के पत्तों में पॉलीफेनॉल्स नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो शरीर में मौजूद फ्री-रेडिकल्स और दूसरी बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। वहीं, पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से एक सार्थक पहल है। साथ ही, समारोह में प्लास्टिक या स्टीरोफोम के मुकाबले केले के पत्तों को डिकंपोज करना बहुत ही आसान होता है। -डॉ अमर सिंह, प्राचार्य को-ऑपरेटिव कॉलेज हिंदू शास्त्रों में केले के पेड़ को देवताओं का पेड़ माना गया है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी इस पेड़ में निवास करते हैं। इसलिए, इसे बहुत पूजनीय माना जाता है और इसकी पूजा करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी केले के पेड़ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान भगवान राम ने केले के पत्तों का उपयोग आश्रय बनाने और भोजन करने के लिए किया था। -डॉ. रमेश कुमार उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य सिटी रिपोर्टर | जमशेदपुर धर्म सास्था मंदिर बिष्टुपुर में चल रहे प्रीति महोत्सव अपनी विशेष पूजा पद्धति के लिए जाना जाता है। यहां दक्षिण भारतीय रीति-रिवाज से होने वाले अनुष्ठान में पर्यावरण का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। मंदिर समिति के लोगों में आस्था के साथ पर्यावरण की भी फ्रिक दिख रही है। अनुष्ठान के दौरान प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं किया जा रहा है। शनिवार से मंदिर में प्रतिदिन दस हजार श्रद्धालु भोग ग्रहण करना शुरू कर दिए हैं। यहां चाय कागज के कप में, तो पानी पीने के लिए कागज के ग्लास का उपयोग किया जा रहा है। जबकि दूसरे मंदिरों से अलग यहां प्रसाद भी केले के पत्ते पर परोसा जाता है। इसके लेकर आयोजन समिति रोजाना 11 हजार केले का पत्ता मंगा रही है। यह पत्ता आंध्र प्रदेश से खड़गपुर होते हुए मंदिर पहुंचता है। इसके अलावा कोलकाता से भी केले के पत्ते आते हैं। दस दिवसीय अनुष्ठान के दैारान करीब एक लाख से अधिक केले के पत्ते का उपयोग होता है। इसकी मुख्य वजह इसकी शुद्धता है। इधर मंदिर के सेवादार नागराज ने बताया कि पूजा के दौरान प्रसाद में विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके लिए छह रसोइया केरल से आए हैं और श्रद्धालुओं की सेवा के लिए हर साल नि:स्वार्थ भाव से केरल से यह टीम आती है।

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