इंदौर में चेहरे के लकवे के मरीज बढ़े:ढाई महीने में 125 से ज्यादा मरीज अस्पताल पहुंचे; डॉक्टरों ने समय पर इलाज की दी सलाह

नवंबर-दिसंबर में अचानक तापमान गिरावट के चलते इंदौर में सेहत पर असर पड़ना शुरू हो गया है। वायरल संक्रमणों में वृद्धि के अलावा, एमवाय अस्पताल के डॉक्टर फेशियल पाल्सी (बेल पाल्सी) के मामलों में भी बढ़त देख रहे हैं। यह चेहरे के अचानक लकवे का एक रूप है जो सर्दियों की हवाओं और तापमान में अचानक बदलाव से जुड़ा होता है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच एमवाय अस्पताल के फिजियोथेरेपी विभाग ने 125 से अधिक ऐसे मरीजों का इलाज किया है। जो वरिष्ठ डॉक्टरों के अनुसार साल के इस समय के लिए सामान्य से कहीं अधिक है। कई मरीज चेहरे के अचानक लटकने, एक आंख बंद करने में कठिनाई, चबाने में परेशानी, धुंधली दृष्टि और साफ न बोल पाने जैसे लक्षणों के साथ आए थे, जो चेहरे की नसों के लकवे के साफ लक्षण हैं। डॉ. गोयल के अनुसार, जो लोग सीधे ठंडी हवा में रहते हैं, गर्म कमरे से अचानक ठंडे मौसम में निकलते हैं या खिड़की के पास सोते हैं, उनमें यह समस्या ज्यादा देखी गई है। ऐसे मामलों में अगर पहले तीन दिन के भीतर इलाज शुरू हो जाए, तो रिकवरी जल्दी होती है। इलाज में देरी होने पर नुकसान बढ़ सकता है। 48 से 72 घंटे में उपचार शुरू हो जाए तो ठीक हो सकते हैं डॉ. गोयल ने बताया कि बेल्स पाल्सी की शुरुआत में चेहरे के एक तरफ कमजोरी महसूस होती है। 48 से 72 घंटे में इसके लक्षण साफ नजर आने लगते हैं। अगर समय पर इलाज शुरू हो जाए तो करीब 95% मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, लेकिन देरी होने पर समस्या गंभीर हो सकती है। उन्होंने बताया कि ठंड लगने, वायरल संक्रमण या चेहरे की नस में सूजन के कारण चेहरे का आधा हिस्सा प्रभावित हो जाता है। इससे मुस्कान टेढ़ी हो जाती है और आंख बंद करने में परेशानी होती है। ऐसे मामलों में फिजियोथेरेपी से काफी राहत मिलती है। अगर तकलीफ बढ़े तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट या ईएनटी विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। लगातार हवा के संपर्क में रहने वाले किशोरों पर ज्यादा असर डॉ. गोयल ने बताया कि इलाज के दौरान आने वाले मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आईं। स्टडी में सबसे ज्यादा मरीज 22 से 42 साल की उम्र के कामकाजी लोग थे। इसके अलावा 15 से 18 साल की उम्र के 26 किशोर भी शामिल थे। डॉक्टरों ने पाया कि कई किशोरों में लक्षण ठंडी सुबह स्कूल या कोचिंग आते-जाते शुरू हुए। वहीं वयस्कों में 29 से 39 साल का आयु वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, इसके बाद 40 साल की उम्र के मरीजों की संख्या थी।

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