पंचायतनामा चंदनकियारी प्रखंड में कभी एक परगना रहा महाल पूर्व पंचायत अपने नाम और पहचान दोनों में ही विशिष्ट है। राजमहल से निकले नाम के अनुरूप यह पंचायत आज भी किसी ऐतिहासिक धरोहर की तरह अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। मान्यता है कि लगभग एक हजार वर्ष पूर्व पंचकोट राजघराने से आए कुंवर डोमन शेखर ने यहां बसावट की थी और उनका भव्य राजमहल ही इस गांव के नामकरण का आधार बना। कालांतर में महल शब्द बोलचाल और भाषाई प्रभाव के कारण महाल हो गया, जो आज सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज है। इतिहास के साथ-साथ महाल की सबसे बड़ी पहचान इसकी शिक्षा परंपरा है। इसे यूं ही शिक्षाविदों का गांव नहीं कहा जाता है। गांव से निकलकर अनेक लोग उच्च और प्रतिष्ठित पदों तक पहुंचे हैं। एबी शेखर रांची हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे, सीताराम माजी इंजीनियर व वैज्ञानिक के रूप में चर्चित हैं। बीसीसीएल, रेलवे, सेना, पुलिस, बैंकिंग, शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में गांव के सैकड़ों लोग सेवाएं दे चुके हैं या दे रहे हैं। अब तक करीब 60 लोग शिक्षक सेवा में रह चुके हैं, जिन्होंने गांव में शिक्षा की मजबूत नींव रखी। आजादी के बाद ही यहां मिडिल स्कूल की स्थापना हुई थी, जिसे स्वर्गीय बिंदेश्वरी प्रसाद शेखर ने अपनी जमीन पर बनवाया था। पंचायत महाल पूर्वी जनसंख्या 6504 महाल गांव। नेतृत्व में भी गांव का योगदान उल्लेखनीय महाल की एक और बड़ी विशेषता है हिंदू-मुस्लिम भाईचारा। विभिन्न जाति और समुदायों के लोग यहां सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहते हैं। कभी सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ। सभी पर्व-त्योहार मिल-जुलकर मनाए जाते हैं। धार्मिक दृष्टि से भी गांव समृद्ध है। प्रसिद्ध चिटाही धाम, प्राचीन धर्मराज मंदिर, दुर्गा, काली, विष्णु मंदिरों के साथ दो मस्जिदें और एक जैन मंदिर यहां की धार्मिक विविधता को दर्शाते हैं। इतिहास, शिक्षा, संस्कृति और सौहार्द, इन चार स्तंभों पर खड़ा महाल गांव आज भी क्षेत्र के लिए प्रेरणा बना हुआ है। महाल पूर्वी पंचायत विकसित गांव है। इसके पूरब में मानपुर, दक्षिण में इजरी नदी, उत्तर में अमलाबाद और पश्चिम में देवग्राम गांव है। कनेक्टिविटी सभी तरह के वाहनों से आना-जाना होता है। जिला मुख्यालय से दूरी 28 किमी पहचान पहाड़ और मंदिर साक्षरता दर 90 प्रतिशत


