इफ्तार कराने वाले को रोजा रखने के बराबर मिलता है पुण्य : मौलाना अब्दुल

मौलाना अब्दुल माजिद ने कहा कि यह रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत का अशरा है। इस रमजानुल मुबारक के महीने में अल्लाह ताला हर एक शख्स की मगफिरत (माफी) फरमा देता है। कुछ लोग ऐसे हैं, जिनकी मगफिरत इस रमजानुल मुबारक के पाक महीने में भी नहीं होती है। वे हैं मां-बाप के नाफरमान (बात नहीं मानने वाले), दिल में कीना कपट (नफरत) रखने वाले, शराब पीने वाले, कत्ल करने वाले, रिश्ता तोड़ने वाले इन लोगों की रमजानुल मुबारक के मौके पर भी मगफिरत नहीं होती है। रमजान के महीने को तीन हिस्से में बांटा गया है, पहला रहमत का अशरा जो गुजर चुका है। दूसरा मगफिरत का अशरा चल रहा है। तीसरा जहन्नम से आजादी का अशरा है। अल्लाह के नबी (स.) ने फरमाया जो शख्स रोजेदारों को रोजा इफ्तार कराता है। अल्लाह रोजा रखने वाले के समान उसे सवाब (पुण्य) देते हैं। आप (स.) ने फरमाया चाहे एक खजूर खिला दें या एक घूट लस्सी ही क्यों ना हो रोजा इफ्तार कराने का सवाब आपको मिल जाएगा। आपके पास जितना है, आप उतने से ही इफ्तार करा कर उसका सवाब हासिल कर सकते हैं।

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