रमजान का पवित्र महीना अपने साथ बेशुमार रहमतें और बरकतें लेकर आता है। इस मुबारक माह में रखे गए रोज़े का दर्जा अल्लाह के यहां बेहद ऊंचा है। हदीसों में उल्लेख है कि रोज़ा क़यामत के दिन अपने रोज़ेदार के लिए सिफारिश करेगा और उसे जहन्नुम से निजात दिलाने का जरिया बनेगा। रमजान में इबादत के साथ माली इबादत का भी खास महत्व है। इस महीने में जकात अदा कर माल को पाक किया जाता है और जरूरतमंदों की मदद की जाती है। कहा गया है कि रमजान में दी गई जकात और सदका का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। रोज़ा केवल भूख-प्यास से दूर रहने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, तक़वा और इंसानियत को अपनाने का पैगाम है। यही वजह है कि रमजान बंदे को रूहानी तौर पर मजबूत बनाता है और समाज में हमदर्दी व भाईचारे को बढ़ावा देता है। जैंतगढ़ जमीअत-ए-अहले हदीस के सचिव मौलाना जाकिरुल्लाह असरी ने कहा कि इस्लामी हुकूमत के निज़ाम के अनुसार जकात की पूरी रकम स्थानीय जमीअत के बैतुल माल में जमा करना अधिक बेहतर और प्रभावी तरीका है। इससे जरूरतमंदों को एकमुश्त बड़ी आर्थिक सहायता दी जा सकती है, जिससे उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान संभव हो पाता है। उन्होंने बताया कि बैतुल माल की राशि मदरसों, गरीबों, मिस्कीनों, यतीमों, मजबूर और असहाय लोगों की सहायता, कर्ज की अदायगी तथा मेडिकल इमरजेंसी जैसी आवश्यक जरूरतों पर खर्च की जाती है। मौलाना असरी ने कहा कि आजकल लोग जकात की रकम को स्वयं थोड़ी-थोड़ी करके जरूरतमंदों और मदरसों के चंदे में बांट देते हैं, जिससे बैतुल माल में पर्याप्त राशि एकत्र नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप जरूरतमंदों को बड़ी और ठोस मदद देने में कठिनाई होती है। उन्होंने अपील की कि लोग जकात की रकम संगठित तरीके से बैतुल माल में जमा करें, ताकि सामूहिक रूप से अधिक प्रभावी और व्यापक सहायता सुनिश्चित की जा सके।


