अविभाजित राजनांदगांव जिला व नवीन जिला मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी का सबसे बड़ा मोंगरा बैराज लगभग 20 वर्षों बाद सूखने की कगार पर है। फिलहाल ये डेड स्टोरेज में पहुंच गया है। शिवनाथ नदी पर बने मोंगरा बैराज का निर्माण छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के साथ ही शुरू हुआ था। इसकी क्षमता 40 मिलियन क्यूबिक मीटर है। पानी की कमी से डैम के पानी में रहने वाले पेड़ों के ठूंठ दिखने लगे हैं। इनसेट: मानसून में डैम। छत्तीसगढ़ के पांच बांध लगभग सूख चुके, बाकी छोटे-बड़े 37 बांधों में 2023 की तुलना में आधे से कम पानी राकेश पाण्डेय की रिपोर्ट प्रदेश में जल संकट की स्थिति गंभीर है। 5 बांध लगभग सूख गए हैं। मुरुमसिल्ली, मोगरा बैराज, पेंड्रावन, मयाना और घुमरिया में पानी का स्तर शून्य प्रतिशत है। जबकि 8 अन्य बांधों में पानी 10 फीसदी से भी कम बचा है। इसके अलावा दूसरे अन्य बांधों में पानी का स्तर पिछले दो साल में सबसे कम है। 2023 के मुकाबले इस बार बांधों में आधे से भी कम पानी है। 2023 में प्रदेश के सभी 46 बांधों में औसत पानी 55.8 प्रतिशत था। जबकि, इस बार केवल 25.7 प्रतिशत पानी ही बचा है। सबसे बड़े बांधों में से एक मिनीमाता बांगो में 2023 के मुकाबले आधे से भी कम पानी है। कोरबा जिले में स्थित इस बांध में केवल 26.5 प्रतिशत पानी है, जबकि 2023 में यहां 61.2 प्रतिशत पानी था। इन शहरों को इस बार होगी ज्यादा दिक्कत मोंगरा: दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव बेमेतरा, सिमगा जैसे छोटे-बड़े शहरों और गांवों को पानी शिवनाथ नदी से मिलता है। गर्मी में जब नदी का पानी सूख जाता है, तब इसी बैराज से पानी छोड़ा जाता है। चूंकि इस बार बिल्कुल पानी नहीं है। इसलिए गर्मी में पानी का संकट तय है। मुरुमसिल्ली: इस बांध के पानी को गंगरेल बांध के रिजर्व बैकअप के लिए इस्तेमाल किया जाता है। गंगरेल प्रदेश का सबसे बड़ा बांध है। और इसका पानी की सप्लाई कई बड़े शहरों और बीएसपी सहित कई उद्योगों को होती है। इस बार गंगरेल का पानी खत्म हुआ तो बैकअप नहीं होगा। भास्कर एक्सपर्ट – जयंत बिसेन, डिप्टी डायरेक्टर, मेट्रोलॉजी बांध सूखने का कारण प्रदेश में नान मॉनसून सीजन यानी अक्टूबर से मई तक की अवधि में बारिश कम हुई। इस बार 30 अप्रैल तक एक तिहाई ही बारिश हुई है। दूसरा- औसत तापमान भी ज्यादा रहा है। इसकी वजह से बांधों से वाष्पीकरण भी ज्यादा हुआ। तीसरी वजह है क्रॉप पैटर्न। गर्मी की धान को ज्यादा पानी की जरूरत होती है। किसानों ने गर्मी की धान के लिए भू-जल का ज्यादा दोहन किया। इससे बांधों में औसत रूप से पानी कम है।


