जोधपुर में पेट्रोलियम उत्पादों के ट्रांसपोर्टेशन में ईमानदारी बनाए रखने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस सुनील बेनीवाल की कोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट कर दिया है कि यदि ट्रांसपोर्टर के किसी एक टैंकर में भी ‘डुप्लीकेट डिप रॉड’ (टैंकर में ऑयल मापने वाली रॉड) मिलती है, तो तेल कंपनी को उसके पूरे फ्लीट (सभी वाहनों) को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार है। कोर्ट ने शुक्रवार को सुनाए फैसले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की सख्त कार्रवाई को सही ठहराते हुए ट्रांसपोर्टर की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने ट्रांसपोर्टर का वह समझौता प्रस्ताव भी ठुकरा दिया, जिसमें उसने दोषी टैंकर को ब्लैकलिस्ट कर बाकी 9 टैंकरों को छोड़ने की गुहार लगाई थी। घटनाक्रम: अनुबंध और औचक निरीक्षण मामले की शुरुआत 4 मई 2024 को हुई एक घटना से हुई। याचिकाकर्ता मैसर्स राजपूताना फ्रेट कैरियर, जिसके पार्टनर गोपाल सिंह चौहान हैं, का इंडियन ऑयल के साथ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स ट्रांसपोर्टेशन का कॉन्ट्रैक्ट था। यह कॉन्ट्रैक्ट 15 सितंबर 2021 को अवार्ड किया गया था और 17 मई 2022 को निष्पादित हुआ था, जिसकी वैधता 15 मई 2027 तक थी। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत फर्म के 10 टैंकर ट्रांसपोर्टेशन कार्य में लगे थे। 4 मई 2024 को इंडियन ऑयल के लोकेशन इंचार्ज और सेफ्टी ऑफिसर ने जोधपुर में एक औचक निरीक्षण किया। इस दौरान राजपुताना फ्रेट कैरियर के एक टैंकर में केबिन के पीछे टूल बॉक्स में एक ‘डुप्लीकेट डिप रॉड’ मिली। जांच में पाया गया कि यह रॉड टैंकर के स्टैंडर्ड कैलिब्रेशन चार्ट से मेल नहीं खाती थी। लंबी सुनवाई के बाद 10 टैंकर्स ब्लैकलिस्ट डिप रॉड मिलने के बाद आईओसीएल ने अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। फर्म को पहले 21 अगस्त और फिर 28 अगस्त 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने 10 नवंबर 2024 और विस्तृत रूप से 23 नवंबर 2024 को अपना पक्ष रखा। मामले में 3 फरवरी 2025 को याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का मौका भी दिया गया। हालांकि, कार्रवाई में देरी का एक प्रमुख कारण यह रहा कि जिन दो अधिकारियों ने सुनवाई की थी, उनका बाद में स्थानांतरण हो गया। इसके चलते प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी पड़ी और याचिकाकर्ता को 1 अक्टूबर 2025 और 7 अक्टूबर 2025 को दोबारा नोटिस भेजे गए, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। अंततः, 16 अक्टूबर 2025 को इंडियन ऑयल के चीफ जनरल मैनेजर (ऑपरेशंस) ने कड़ा फैसला सुनाया। आदेश के तहत, दोषी टैंकर को घटना की तारीख से 2 साल (3 मई 2026 तक) और बाकी 9 टैंकरों को आदेश की तारीख से 2 साल (16 अक्टूबर 2027 तक) के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। मानी एक टैंकर की गलती, दिया समझौता प्रस्ताव याचिकाकर्ता राजपूताना फ्रेट कैरियर की ओर से वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि सजा ‘समानुपात के सिद्धांत’ के तहत होनी चाहिए। उनका कहना था कि गलती एक टैंकर की है, तो सजा पूरे फ्लीट को क्यों दी जा रही है? उन्होंने कोर्ट के सामने एक समझौता प्रस्ताव भी रखा कि वे दोषी करार दिए गए एक टैंकर की ब्लैकलिस्टिंग स्वीकार करने को तैयार हैं, बशर्ते उनके बाकी 9 टैंकरों को संचालित करने की अनुमति दी जाए। याचिकाकर्ता ने यह अजीब दलील भी दी कि बरामद रॉड पर ‘पॉजिटिव मार्किंग’ थी, जिसका इस्तेमाल करने पर तेल कम नहीं, बल्कि ज्यादा डिलीवर होता, जिससे नुकसान ट्रांसपोर्टर को ही होता, न कि कंपनी को। उन्होंने कार्रवाई में हुई देरी को भी आधार बनाया। इंडियन ऑयल का तर्क: तीन गलतियों की माफी नहीं दूसरी तरफ, इंडियन ऑयल के वकील निशांत बोड़ा ने ‘इंडस्ट्री ट्रांसपोर्ट डिसिप्लिन गाइडलाइंस’ के क्लॉज का हवाला दिया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि गाइडलाइंस में तीन अनियमितताओं को सबसे गंभीर माना गया है: इन मामलों में ‘डीमिंग क्लॉज’ लागू होता है, जिसका अर्थ है कि ऐसी वस्तु का मिलना ही ट्रांसपोर्टर की मिलीभगत साबित करने के लिए काफी है। कोर्ट का फैसला: सुरक्षा और साख से समझौता नहीं जस्टिस सुनील बेनीवाल ने इस मामले में 15 जनवरी को बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। 30 जनवरी को सुनाए गए अपने ‘रिपोर्टेबल जजमेंट’ में कोर्ट ने राजपुताना फ्रेट कैरियर की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पेट्रोलियम उत्पादों में मिलावट और चोरी रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं: जानें क्या होती है डुप्लीकेट डिप रॉड: टैंकर में तेल की मात्रा मापने के लिए एक मानक छड़ (डिप रॉड) होती है। अगर इसके अलावा कोई और छड़ मिले जिससे तेल की मात्रा गलत दिखाई जा सके, तो उसे डुप्लीकेट डिप रॉड कहते हैं। यह तेल चोरी का बड़ा जरिया मानी जाती है।


