राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2023 से पहले जोर-शोर से पार्टी बदलने वाले नेताओं की लंबी लिस्ट थी। पूर्व कैबिनेट मंत्री से लेकर कांग्रेस-बीजेपी के दिग्गज नेता इधर-उधर हुए थे। अब एक साल बाद भी कई नेता नई पार्टी में एडजस्ट नहीं हो पाए। कई नेताओं ने सदस्यता अभियान जैसे पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बना ली है तो कुछ नेता हाल ही में हुए उप-चुनाव प्रचार तक में नजर नहीं आए। ऐसे नेताओं से कुछ सवाल किए गए… क्या उन्हें नई पार्टी रास आ रही है? क्या जरूरी मौकों पर पार्टियां याद नहीं कर रहीं? क्या उन्हें नई पार्टी से किसी तरह की कोई नाराजगी है? ऐसे ही कई सवालों के जवाब पढ़िए इस रिपोर्ट में… इन प्रमुख नेताओं ने छोड़ा था अपनी पार्टी का बरसों पुराना साथ
महेंद्रजीत मालवीय, लालचंद कटारिया, राजेंद्र यादव, खिलाड़ी लाल बैरवा, राहुल कस्वां, ज्योति मिर्धा, प्रहलाद गुंजल जैसे कई नेताओं ने अपनी वफादारी बदलते हुए नई पार्टी का दामन थामा। हालांकि, पार्टी बदलने के बावजूद इनमें से कई नेता नई पार्टी के साथ पूरी तरह से जुड़ नहीं पाए हैं। लेकिन पुरानी पार्टी की नाराजगी भी कम नहीं हुई है। 1. महेंद्रजीत मालवीय : क्षेत्र में पिछड़ा भाजपा सदस्यता अभियान
महेंद्रजीत मालवीय बांसवाड़ा जिले की बागीदौरा सीट से विधायक थे। लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे। बीजेपी में शामिल होते ही पार्टी ने उनको लोकसभा चुनाव का टिकट दिया। उसके बाद मालवीय ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। लोकसभा चुनाव में वे करीब सवा दो लाख वोटों से भारत आदिवासी पार्टी के नेता राजकुमार रोत सेहार गए थे। महेंद्रजीत मालवीय ने पार्टी तो जॉइन कर ली, लेकिन संगठन के कार्यक्रमों और बैठकों में कम ही नजर आते हैं। हाल ही में भाजपा के सदस्यता अभियान में ऑनलाइन प्रक्रिया समाप्त होने तक बांसवाड़ा सदस्यता के मामले में पिछड़ा हुआ नजर आया था। बांसवाड़ा में ऑनलाइन प्रक्रिया समाप्त होने तक 71 हजार ही सदस्य बनाए गए थे। मालवीय का दावा है कि बांसवाड़ा ने इस बार सदस्यता के मामले में बीते सालों से बेहतर प्रदर्शन किया है। महेंद्रजीत मालवीय से बातचीत के कुछ अंश… सवाल : कितनी रास आ रही है बीजेपी?
जवाब : मैंने तो डबल इंजन की सरकार के साथ में अपना संबंध जोड़ा है। मैं कस के काम कर रहा हूं। मुझे उन्होंने टिकट दिया, मैंने चुनाव लड़ा। अमित शाह, जेपी नड्डा और राजस्थान के मुख्यमंत्री ने मुझे पार्टी जॉइन कराई। मेरे चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री मोदी भी बांसवाड़ा आए। हार-जीत अपनी जगह पर है। मैं हार गया। मुझे कोई तकलीफ नहीं है। सवाल : 30 साल कांग्रेस के साथ रहे, विचारधारा में तालमेल बैठाने में परेशानी आई?
जवाब : नहीं मुझे कोई तकलीफ नहीं है, मैं मस्ती से काम कर रहा हूं सवाल : बीजेपी की तरफ से कई कार्यक्रम हुए, जिसमें हाल ही में प्रधानमंत्री का राजस्थान दौरा शामिल है। आपकी उपस्थिति नहीं होने का क्या कारण है?
जवाब : प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में हेलीपैड पर मुलाकात करने वाले 5 नेताओं में मेरा नाम था। प्रधानमंत्री को सीऑफ करने में मेरा नाम था। अब हर जगह तो नहीं जा सकता न.. सवाल : सदस्यता अभियान में आपकी सक्रियता पर भी सवाल खड़े हुए हैं?
जवाब : बांसवाड़ा में 1300 बूथ हैं। 1300 में से हमने सदस्यता अभियान को पूरा किया। सवाल : लेकिन फिर भी बांसवाड़ा को सदस्यता अभियान के तहत कम बता रहे हैं?
जवाब : ऐसा कुछ नहीं है। आज तक 1300 में से 1300 बूथ कभी पूरा नहीं हुआ। हमने पहली बार सौ प्रतिशत सदस्यता अभियान को पूरा किया। सवाल : बीजेपी दफ्तर में भी कई कार्यक्रम आयोजित होते रहे है संगठन की ओर से..उनमें आप नदारद ही रहे हैं?
जवाब : एक ऐसा कार्यक्रम नहीं है, जिसमें मैं नहीं आया। सवाल : विधानसभा उपचुनाव के बाद दो बड़े कार्यक्रम हुए..उनमें तो आप नहीं थे?
जवाब : देखिए अब 100 प्रतिशत तो अटेंड करना जरूरी होता नहीं है। कई सारे व्यक्तिगत काम भी होते हैं। 2. प्रहलाद गुंजल : कांग्रेस के नेताओं में तालमेल की कमी
हाड़ौती के तेज तर्रार नेता प्रहलाद गुंजल की गिनती पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खास लोगों में होती है। बीजेपी छोड़कर गुंजल ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा का टिकट देकर कोटा से चुनाव लड़वाया था। लेकिन वे हार गए। कई बार कांग्रेस के नेताओं के साथ उनकी नाराजगी सामने आ चुकी है। शांति धारीवाल के साथ उनके खटास भरे रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। गुंजल कांग्रेस के संगठन के कार्यक्रमों में कम ही नजर आते हैं। हालांकि गुंजल की अपनी पुरानी पार्टी भाजपा से नाराजगी कम नहीं हुई है। अब गुंजल कांग्रेस से बागी हुए नरेश मीणा को न्याय दिलाने के लिए भी पूरा जोर लगा रहे हैं। इसको लेकर कांग्रेस के नेताओं की बेरुखी पर गुंजल सवाल उठा चुके हैं। पढ़िए उनसे बातचीत के अंश… सवाल : समरावता मामले में नाराजगी भी जाहिर की थी आपने?
जवाब : कोई नाराजगी नहीं है। सरकार के अत्याचार के खिलाफ पूरी कांग्रेस एक है। सवाल : पार्टी कार्यक्रमों में आपकी उपस्थिति कम दिखती है। क्या कारण है विचारधारा से मेल नहीं खा पा रहे हैं?
जवाब : ऐसा कुछ नहीं है। बीजेपी की जो विचारधारा थी, उससे जो मेल खा रहे हैं उनकी क्या दुर्गति हो रही है। किरोड़ी लाल जी से पूछिए न क्या हो रहा है उनके साथ। वसुंधरा जी जैसी इतनी दिग्गज नेता को दो मिनट में हाशिए पर कर दिया न। पहली बार के विधायक को पर्ची से निकाल कर….तो ये तो कोई बात ही नहीं है विचारधारा वाली। बीजेपी में अब कोई विचारधारा जैसी चीज ही नहीं है। केवल ढोंग और ढकोसला है। दिल्ली जो तय करती है, वैसा होता है। 3. लालचंद कटारिया : जयपुर के नेता भी नहीं दिखे राइजिंग राजस्थान में
गहलोत सरकार में कृषि मंत्री रहे लालचंद कटारिया की गिनती कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में होती थी। माना जाता है वे पार्टी में अनदेखी से नाराज थे। इसी कारण से विधानसभा चुनाव लड़ने से भी इनकार कर दिया था। यही वजह थी कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में अभिषेक चौधरी को उनकी जगह झोटवाड़ा (जयपुर) से टिकट दिया था। इस बीच लोकसभा चुनाव से पहले अंतरात्मा की आवाज का हवाला देते हुए कटारिया ने भाजपा का दामन थामा था। भाजपा जॉइन करने के बाद भी कटारिया बीजेपी के कार्यक्रमों से दूरी बनाए हुए हैं। जयपुर में भजनलाल सरकार का राइजिंग राजस्थान जैसा बड़ा कार्यक्रम हुआ। जयपुर से ही ताल्लुक रखने वाले लालचंद कटारिया उसमें नदारद रहे। भाजपा के संगठन संबंधी कार्यक्रमों में कटारिया की उपस्थिति न के बराबर रही है। लालचंद कटारिया बोले- बुलाते हैं तो जरूर जाता हूं
टेलिफोनिक बातचीत में लालचंद कटारिया ने बताया- मैं अभी तो विदेश में हूं। इसलिए बीते लंबे समय से बीजेपी के किसी कार्यक्रम में नहीं जा पाया। जब भी मुझे बुलाते हैं, मैं जरूर जाता हूं। उपचुनाव के बाद के सभी कार्यक्रमों में शामिल हुआ था। सदस्यता अभियान में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जो काम दिया गया था, हमने पूरा किया है। 4. ज्योति खंडेलवाल : पद नहीं है, इसलिए संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो पाती
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अक्टूबर में जयपुर की पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल ने बीजेपी का दामन थाम लिया था। वजह थी वे जयपुर की किसी सीट पर टिकट चाहती थीं। टिकट नहीं मिलने पर पार्टी छोड़ दी। बीजेपी में आने के बाद उन्हें न तो टिकट मिला, न ही पार्टी में कोई पद। ज्योति 2004 में पहली बार पार्षद बनीं। 2009 में मेयर के पद पर सीधी चुनी गईं। 2019 में जयपुर शहर लोकसभा सीट से सांसद का चुनाव लड़ा और हार गईं। भास्कर से बातचीत के कुछ अंश… सवाल : पार्टी में मन नहीं रम रहा या जुड़ाव नहीं हो पाया?
जवाब : विचारधारा की समस्या नहीं है, अपनी बात को मजबूती से रखती आई हूं। संगठन के साथ अभी भी जुड़ाव नहीं हो पाया है, क्योंकि कोई पद नहीं है। इसलिए भी संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो पाती हूं। लगता है कि काश मैं भी उन बैठकों का हिस्सा बन सकूं। उम्मीद है जल्द ही संगठन की नई टीम बनेगी। सवाल : पार्टी में नई जिम्मेदारी पर कोई चर्चा हुई है?
जवाब : राजनीति में संतुष्टि वाली कोई बात नहीं होती है। मुझे उम्मीद है की मेरी क्षमता के अनुसार मुझे जिम्मेदारी मिलेंगी। बाकी मुझे जो भी काम दिया जाता है मैं उसे कर रही हूं। 5. राजेन्द्र यादव : सोशल मीडिया पोस्ट तक ही सीमित पार्टी प्रेम
राजस्थान के पूर्व गृह राज्यमंत्री एवं कोटपूतली से लगातार दो बार विधायक रह चुके राजेन्द्र सिंह यादव ने 2008 में कांग्रेस के टिकट से विधानसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए। इसके बाद 2013 में कांग्रेस के टिकट पर जीतकर पहली बार विधायक बने। 2018 के चुनाव में भी कांग्रेस के टिकट पर लगातार दूसरी बार जीत हासिल की और गहलोत सरकार में गृह राज्यमंत्री बने। गहलोत सरकार में अच्छी पकड़ होने के चलते प्रदेश में नए जिलों के गठन में कोटपूतली को जिला घोषित करवाया गया। लेकिन विधानसभा चुनाव में बहुत कम वोटों के अंतर से हार गए। उसके बाद राजेन्द्र यादव ने कांग्रेस पार्टी से नाराजगी जाहिर करते हुए भाजपा जॉइन कर ली। भाजपा में शामिल होने के बाद भी यादव पार्टी से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। यही कारण है कि वो न तो भाजपा के दफ्तर में, न ही किसी बड़े कार्यक्रम में ही नजर आते हैं। राजेन्द्र यादव का पार्टी के प्रति जुड़ाव सिर्फ उनकी सोशल मीडिया पोस्ट तक ही सीमित रह गया है। नई पार्टी के रंग में रंगे नेता
दल बदल कर दूसरी पार्टी में आए नेताओं में कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो दूसरी पार्टी के रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। इसमें कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुई ज्योति मिर्धा और भाजपा से कांग्रेस में आए राहुल कस्वां शामिल हैं। दोनों ही नेता अपनी नई पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेते नजर आते हैं। चुनाव के दौरान भी ये अपनी पार्टी के प्रचार में पसीना बहाते रहे थे। राहुल कस्वां : बीजेपी पर आक्रामक हो रहे
लगातार 2 बार चूरू से बीजेपी सांसद रहे राहुल कस्वां का लोकसभा चुनाव 2024 में टिकट काट दिया था। ऐसे में बगावती तेवर दिखाते हुए कस्वां ने बीजेपी से इस्तीफा दे दिया। राहुल कस्वां के टिकट कटने के पीछे राजेंद्र राठौड़ से उनकी अदावत को वजह बताया गया था। कस्वां ने कांग्रेस जॉइन की और टिकट लेकर चूरू से लोकसभा चुनाव लड़ा। कस्वां ने भाजपा के देवेंद्र झाझड़िया को 72 हजार से अधिक वोटों से हराया। राहुल कस्वां पार्टी बदलने के बाद भी काफी सक्रिय नजर आते हैं। कस्वां हरियाणा में भी कांग्रेस का प्रचार करते नजर आए थे। इसके साथ ही कस्वां भाजपा पर भी आक्रामक बयानबाजी करते रहते हैं। बीते महीने में भी एक बैठक के दौरान भाजपा के स्थानीय विधायक हरलाल सहारण और राहुल कस्वां आमने-सामने हो गए थे। ज्योति मिर्धा : पार्टी में बड़ा पद देने की तैयारी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे नाथूराम मिर्धा की पोती ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा जॉइन कर ली थी। इसके बाद ज्योति को बीजेपी ने नागौर लोकसभा सीट से प्रत्याशी घोषित किया हालांकि वहां से उनको हार का सामना करना पड़ा। लेकिन ज्योति मिर्धा संगठन और पार्टी के कार्यक्रमों में खासी सक्रिय नजर आती है। ज्योति मिर्धा बीजेपी में प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर हैं। सूत्रों के अनुसार, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की टीम में जनवरी से बदलाव होने शुरू हो जाएंगे। प्रदेश कार्यकारिणी से कुछ नेता हटेंगे और नए चेहरे सामने आ सकते हैं। कांग्रेस से बीजेपी में शामिल होकर चुनाव लड़ीं व इन उपचुनाव में खींवसर सीट पर बीजेपी की जीत में भूमिका निभाने वाली ज्योति को प्रदेश महामंत्री जैसे पद दिए जा सकते हैं। एक्सपर्ट बोले- अब पार्टियों को सिर्फ जिताऊ कैंडिडेट चाहिए
राजनीतिक एक्सपर्ट ओम सैनी कहते हैं- 1978 से पहले राजस्थान में इस तरह की बातें नहीं होती थी। पहली बार मोहनलाल सुखाड़िया जब बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाए थे, तब दल-बदल का सिलसिला हुआ था। फिर भैरोंसिंह शेखावत के समय कुछ ऐसा ही हुआ। जब नेता इधर से उधर चले जाते हैं तो मतदाता ठगा सा महसूस करता है। जिनकी कोई विचारधारा नहीं होती वही दल-बदल करते हैं। क्योंकि उन नेताओं के पास जनबल होता है। इसलिए भी वो पॉलिटिकल पार्टियों से मोलभाव करते हैं। आजकल पार्टियों के लिए एक ही बात जरूरी है वो है कि कैंडिडेट जिताऊ होना चाहिए। लेकिन ये देश की राजनीति के लिए अच्छा नहीं है।


