सिटी एंकर बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे के की राह पर चलते हुए एक और पूर्व डीएसपी कथा वाचक बन गए हैं। छपरा जिले के सिताबदियारा लोहा टोला के रहने वाले रामनाथ सिंह ग्रामीण क्षेत्रों में नि:शुल्क कथा सुनने का काम कर रहे हैं। उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि भक्ति का मार्ग ही सब मार्गों से बेहतर है। उनके पिताजी भी कथावाचक के साथ-साथ एक अच्छे पुजारी भी थे। रामनाथ जी के जीवन पर उनका काफी प्रभाव पड़ा। यही कारण था कि शुरू से उनका झुकाव धर्म और संस्कारों के प्रति रहा। पुलिस सेवा में होने के बावजूद उनका कथाओं से विशेष लगाव रहा। ड्यूटी के बाद समय निकालकर कथा सुनने पहुंच जाते थे। उनका कहना है कि शहरों में तो संपन्न लोग बड़ी-बड़ी कथाएं करवा लेते हैं, लेकिन गांव के लोग आज भी इससे वंचित हैं। शहर की कुरीतियां गांव तक पहुंच गई हैं। ग्रामीण युवाओं से संस्कार दूर हो चुके हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कथाओं के लिए गांवों को कर्मभूमि के रूप में चुना है। पिछले दो वर्षों में वे 40 से अधिक तीन दिवसीय कथाएं मोहल्ला-टोलों में कर चुके हैं। इसके लिए वह पैसा नहीं लेते हैं। वह कहते हैं कि नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद कथा सुनाने का उनका एक ही उद्देश्य है कि आज के युवाओं में, बच्चों में अच्छे संस्कार का संचार हो। उत्तर की तुलना में दक्षिण भारत के लोग अध्यात्म से ज्यादा जुड़े: पूर्व डीएसपी का कहना है कि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत के लोग अध्यात्म और धार्मिक गतिविधियों से अधिक जुड़े नजर आते हैं। शिव, राम और हनुमान से उनका विशेष लगाव है। रामनाथ सिंह बेंगलुरु में भी कई जगह रामचरित्र मानस और शिव पुराण की कथा कर चुके हैं। यह पूछने पर कि खाली समय में क्या करते हैं, तो उन्होंने बताया कि जब कथा नहीं होती है, तो उनका समय रामकृष्ण मिशन, योगदा आश्रम की पुस्तक पढ़ने में समय व्यतीत होता है। वह भगवा वस्त्र नहीं पहनकर, शादी के कपड़ों में कथा करते हैं। वे कहते हैं कि वह कोई दीक्षित संत नहीं हैं जिसे कई नियमों का पालन करना पड़ता है और भगवा वस्त्र पहनना जरूरी हो जाता है। नौकरी के बाद राजनीति में आने का था मन रामनाथ सिंह रांची में ट्रैफिक डीएसपी के पद से 2013 में सेवानिवृत हुए। वे पुलिस सेवा के दौरान राष्ट्रपति और पुलिस गोल्ड मेडल से सम्मानित हो चुके हैं। पढ़ाई के समय से ही झारखंड के पूर्व डीजीपी बीडी राम से निकटतम संबंध होने के कारण नौकरी के बाद उनका मन राजनीति में आने का था। उन्होंने भाजपा की सदस्यता भी ली, लेकिन उनका मन इसमें रमा नहीं। इसके बाद समाज के लिए कुछ करने के लिए उन्होंने कथावाचन का निर्णय लिया। गांव में शामियाना और लाउडस्पीकर लगाकर कथा सुनाते हैं।


