बरसात का मौसम जा चुका हैं, लेकिन करौली जिले के सरकारी स्कूलों की हालत में सुधार नहीं हुआ है। जर्जर भवनों में पढ़ाई कर रहे बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दर्जनों स्कूलों को बंद कर नजदीकी स्कूलों में स्थानांतरित करना पड़ा है, जबकि सैकड़ों स्कूल अभी भी मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं। इस मामले में कोर्ट की सख्ती ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी गोपाल लाल मीणा ने बताया कि जिले में बारिश के बाद स्कूल भवनों की तकनीकी जांच के लिए ब्लॉक स्तर पर टीमें गठित की गई थीं। इस सर्वे में 25 स्कूलों को पूरी तरह जर्जर घोषित किया गया। विभागीय निर्देशों के बाद इनमें से 21 स्कूलों को नजदीकी स्कूलों में मर्ज कर दिया गया है। तीन स्कूल ऐसे हैं, जिन्हें ध्वस्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि दो हेरिटेज भवनों में संचालित हैं और एक स्कूल भवनविहीन होकर सामुदायिक भवन में चल रहा है। इन तीनों को छोड़कर, शेष 22 जर्जर स्कूल वर्तमान में अन्य सुरक्षित स्कूलों से संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा 737 स्कूलों की मरम्मत के लिए एसडीआरएफ के तहत प्रति स्कूल 2 लाख रुपए की राशि जारी की गई। पहले चरण में 143 स्कूलों के लिए टेंडर प्राप्त हुए, जबकि दूसरे चरण में 594 स्कूलों के लिए टेंडर जारी किए गए। इनमें से अब तक सिर्फ 25 स्कूलों के टेंडर ही प्राप्त हो पाए हैं। मरम्मत कार्य की निगरानी समसा कार्यालय द्वारा की जा रही है। जिले में कुल 1451 स्कूलों का सर्वे किया गया, जिसमें 11,830 कक्षों में से 4,768 सुरक्षित, 1,517 पूर्णतः जर्जर, 3,985 पट्टी की छत वाले और 1,560 आरसीसी छत वाले कक्ष पाए गए। इन सभी की वृहद मरम्मत के लिए विभाग ने 11,443 लाख रुपए (करीब 114 करोड़ रुपये) का प्रस्ताव भेजा है, लेकिन अब तक कोई राशि स्वीकृत नहीं हुई है। निदेशालय के निर्देश पर अब 15 मार्च तक पुनः सर्वे कराया जा रहा है। पीईओ, सीबीओ और तकनीकी अधिकारियों की टीम द्वारा यह कार्य किया जा रहा है, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। एक ओर जर्जर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा खतरे में है, दूसरी ओर फंड और टेंडर प्रक्रिया की धीमी रफ्तार सवाल खड़े कर रही है। अब देखना होगा कि कोर्ट की सख्ती के बाद स्कूलों की मरम्मत और पुनर्निर्माण को कितनी तेजी मिलती है।


