खरसावां गोलीकांड का 78वां शहादत दिवस:मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा- 2027 के शहीद दिवस तक शहीदों के परिवारों को ढूंढ़ निकालेंगे

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि वर्ष 2027 के शहीद दिवस तक खरसावां गोलीकांड के शहीदों के परिवार को ढूंढ़ निकालेंगे। शहीद परिवारों को खोज कर सम्मान देंगे। शहीद परिवारों को चिह्नित करने का मसौदा तैयार है। इसे हमने अपने पास रखा है। पहले इसे समझेंगे। फिर न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेंगे। रिटायर्ड जज और अधि​कारियों को चिह्नित करने में लगाया जाएगा। उनकी हर दिन की गतिविधियों का आकलन किया जाएगा। मुख्यमंत्री गुरुवार को खरसावां गोलीकांड के 78वें शहादत दिवस पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। इससे पहले उन्होंने खरसावां शहीद वेदी पर आदिवासी परंपरा के अनुसार शहीदों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि झारखंड की मिट्‌टी शहादत की गाथाओं से भरी है। जितना समृद्ध इतिहास हमारे राज्य का है, उतना किसी अन्य प्रदेश का नहीं है। इस स्थल से हमें ताकत मिलती है। यहां के अनगिनत लोगों ने जल-जंगल और जमीन की रक्षा और आदिवासी अस्मिता के लिए अपनी जान न्योछावर की। हम लड़े हैं, तभी बचे हैं। भास्कर एक्सपर्ट – दुर्गा उरांव, निवर्तमान अध्यक्ष, झारखंड आंदोलनकारी चिह्नितीकरण आयोग शहीदों को ऐसे चिह्नित कर सकती है सरकार झारखंड सरकार को शहीदों को चिह्नित करने के लिए एक टीम का गठन करना होगा। इसमें स्थानीय भाषा के जानकार, खासतौर पर बुजुर्गों को शामिल करना होगा। इस टीम को स्थानीय लोगों से बात करने के साथ ही सभी संबधित पुराने रिकॉर्ड को खंगालना होगा। उस समय के आयुक्त की रिपोर्ट भी देखनी होगी। यह मामला तत्कालीन राष्ट्रप​ति डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक भी पहुंचा था। वहां से जानकारी जुटानी होगी। इसके अलावा सरकार एक फॉर्मेट तैयार कर स्थानीय लोगों से आवेदन मांग सकती है, जिनके पूर्वज शहीद हुए हों या उस समय घायल हुए हों। फिर इसकी जांच करनी होगी। चूंकि यह सीमित क्षेत्र का मामला है, इसलिए इन तरीकों से शहीदों को चिह्नित करने में सफलता मिल सकती है। खरसावां गोलीकांड…कितने लोग मारे गए, इसका प्रमाण नहीं सरायकेला-खरसावां रियासत को ओडिशा अपने साथ मिलाना चाहता था। यहां के राजा भी इसके लिए तैयार थे। लेकिन आदिवासी अलग झारखंड की मांग कर रहे थे। इसी मांग को लेकर 1 जनवरी 1948 को आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में खरसावां साप्ताहिक हाट में जुटे ​थे। जयपाल सिंह मुंडा वहां अलग झारखंड राज्य का नारा लगा रहे थे। तभी ओडिशा पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। घटना के तीन दिन बाद कोलकाता से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार द स्टेट्समैन ने इससे संबंधित एक खबर छापी इसका शीर्षक था-35 आदिवासी किल्ड इन खरसावां। हालांकि लोग इस घटना में हजारों लोगों के मारे जाने का दावा कर रहे थे। लोगों का कहना था कि एक कुएं को लाश और अधमरे लोगों से भर दिया गया था। हालांकि मौत का वास्तविक आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया। इस गोलीकांड की जांच के लिए एक ट्रिब्यूनल का भी गठन किया गया था, पर रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। इसे भारत का सबसे बड़ा गोलीकांड बताया जा रहा है।

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