भास्कर न्यूज|गुमला खरीफ मौसम में बोई जाने वाली प्रमुख फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, अरहर, मूंग, उड़द आदि नमी व गर्मी वाले वातावरण में उगाई जाती हैं। कृषि विज्ञान केंद्र बिशुनपुर के वैज्ञानिक डॉ. अटल तिवारी ने कहा कि इस दौरान बीज जनित रोगों, मिट्टी जनित रोगों तथा कीटों का प्रकोप अधिक होता है। यदि बीज का समय पर उचित उपचार न किया जाए तो बीज का अंकुरण कम हो सकता है। फसल की प्रारंभिक वृद्धि प्रभावित होती है और उपज में कमी आती है। अतः बीज उपचार खरीफ फसलों की उन्नत खेती के लिए एक आवश्यक व लाभकारी प्रक्रिया है। बीज जनित फफूंद, जीवाणु व वायरस से बचाव होता है। बीज की अंकुरण क्षमता और प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है। रोगों की रोकथाम से पौधे स्वस्थ व मजबूत बनते हैं। उत्पादन में वृद्धि और गुणवत्ता में सुधार होता है। कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। फफूंदनाशी से उपचार: कार्बेंडाजिम 2 ग्राम या थाइरम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर उपचार करें। धान, मक्का, सोयाबीन जैसे फसलों में यह उपचार आवश्यक होता है। कीटनाशी से उपचार: इमिडाक्लोप्रिड 5 मिली या थायोमेथोक्साम 5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें (यदि कीटों का प्रकोप हो)। ट्राइकोडर्मा विरिडे 5-10 ग्राम प्रति किलो बीज राइजोबियम या पीएसबी जैसे लाभकारी जैव उर्वरकों से उपचार (दलहनी फसलों के लिए)। उपचार के विधि कुछ इस प्रकार है, बीजों को किसी साफ पात्र में डालें, आवश्यक मात्रा में दवा मिलाकर हाथ से अच्छी तरह मिलाएं ताकि प्रत्येक बीज पर दवा की परत चढ़ जाए। इसके बाद बीज को छांव में सुखाकर बोआई करें। बीज उपचार एक सरल, कम लागत वाली तकनीक है जो फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर उपज को सुरक्षित करती है। सभी किसानों को इसे अपनाना चाहिए।


