परम्परा नाट्य समिति की ओर से आयोजित 14वां गोपीजी भट्ट स्मृति संगीत नाट्य समारोह का समापन भावपूर्ण अंदाज में हुआ। इस मौके पर गोपीजी भट्ट के बेटे और तमाशा साधक दिलीप भट्ट ने अपनी एकल प्रस्तुति से गुमनामी के कगार पर खड़ी तमाशा शैली को पुनः जीवंत कर दिया। रविन्द्र मंच के स्टूडियो थिएटर में आयोजित इस संध्या में दिलीप भट्ट ने बंशीधर भट्ट रचित गोपीचंद-भर्तृहरि प्रसंग को राग-रागिनियों में प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘लहरिया’ और ‘गणेश वंदना’ से तमाशा की शुरुआत करते हुए, राग मालकोस में माता सुनो हमारी बात, राग वृंदावनी सारंग में क्या सोवे उठ जाग रे गोपीचंद राजा जैसे भावपूर्ण पद प्रस्तुत किए। तमाशा शैली की विशिष्टता को उजागर करते हुए दिलीप भट्ट ने राग पहाड़ी, भूपाली, सिंध काफी, भैरव, भैरवी, केदार और बिहाग को अपने गायन में पिरोया। मधुर स्वर, नृत्य शैली और भाव अभिव्यक्ति के संगम ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति में गोपीजी भट्ट की गायकी की झलक साफ दिखाई दी। कार्यक्रम में तबले पर शैलेन्द्र शर्मा, हारमोनियम पर शैर खान, सारंगी पर मनोहर टांक और सातवीं पीढ़ी के सचिन भट्ट और हर्ष भट्ट ने संगत दी। समापन समारोह का शुभारंभ गोपीजी भट्ट की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस अवसर पर अशोक पाण्डया, विनोद जोशी, राजेंद्र पायल, सर्वेश भट्ट, विनोद पाठक और भागचंद गुर्जर विशेष अतिथि रहे। प्रस्तुति के उपरांत विनोद पाठक और दिलीप भट्ट के बीच संवाद हुआ, जिसमें दिलीप भट्ट ने तमाशा शैली के इतिहास, अपने योगदान और इसके भविष्य पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि तमाशा अब नई पीढ़ी संभालेगी और इसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास जारी रहेगा।


